निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
Page 171 of 1282
Read in contextहिन्दी निरुक्त । ३
वाचक, धातुसे संयुक्त हों, अर्थात्—व्याकरण शास्त्रकी रीति- से उन शब्दोंमें जैसा प्रकृति और प्रत्यय विभाग, बताया है, वह सब उन शब्दोंके स्वर तथा अर्थ के अनुकूल हों, किन्तु कोई विरोध न करता हो, तो वहां व्याकरणकी रीतिसे ही उन शब्दोंका व्याख्यान या निर्वचन करना। वहां निरुक्तके लक्षणके अनुसार व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है। २—जिन शब्दोंमें व्याकरण-शास्त्रकी विधिसे बहुत निपुणतापूर्वक देखनेसे भी स्वर-संस्कार, सहित धातुके द्वारा शब्द वा अर्थ- की कल्पना नहीं की जा सकती है; अर्थात्—व्याकरणकी रीति पर जो कुछ किया जाता है, उससे वहांकें शब्द व अर्थ- की सिद्धि न होकर और ही शब्द या अर्थ बनता दिखाई दे, वहां व्याकरणके अवलम्बको छोड़कर अर्थ-नित्य या अर्थ प्रधान होकर शब्दोंकी परीक्षा करे। प्रयोजन यह है कि— उस नामको देखकर उसमें किसी धातु या अर्थ का कुछ सादृश्य (सामान्य) दिखाई दे, कि—इस धातु या क्रियाका इसमें कोई सम्बन्ध है, उसीसे उसका निर्वचन कर लेना, क्योंकि—अर्थ प्रधान और शब्द, गुणभूत या गौण हैं। इसीसे शब्द सादृश्यकी अपेक्षा अर्थ का सादृश्य अधिक बलवान् होता है। ३—जहां एक शब्दके साथ दूसरे शब्दका अर्थ सादृश्य भी नहीं है, वहां पर अर्थकी समानता न रहने पर भी, स्वर या व्यञ्जन- के सादृश्यको लेकर ही निर्वचन करे, किन्तु ऐसी अवस्थामें भी, व्याकरणोक्त संस्कारोंका आदर न करके, शब्दके निर्व- चनकी टाल न करे। इस प्रकार अर्थ के सामान्य रूपके न होने पर भी स्वर अथवा वर्णके सामान्य मात्रसे भी निर्वचन अवश्य ही करे, ऐसा बिल्कुल