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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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१८ अ० १ पा० १ खं० १ । • आख्यातमें स्त्रीलिङ्ग, पुंलिङ्ग और नपु सकलिङ्ग अर्थात् कारक द्रव्य क्रियाके गुणभूत रूपसे और क्रिया उन के ऊपर प्रधानता- से रहती हुई कही जाती है। कारकोंपर क्रियाकी प्रधानता ! (क) आख्यात में कारकों के ऊपर क्रियाकी प्रधानता इस लिए है, कि यहां क्रिया शब्दसे वाच्य होती है, और कारक अर्थात् से लिए जाते हैं। इसीसे क्रियाकी प्रधानता और कारकों की गौणता है। [विशेष-प्रत्ययाधानात्] •क्रियाकी प्रधानताका दूसरा यह भी कारण है कि ‘पचति’ इत्यादि आख्यात शब्द पचि क्रियामें ही विशेष बुद्धिको उत्पन्न करता हैं। यद्यपि वहां पकानेवाले आदि साधन, जिनमें कि वह क्रिया रहती है, और जो कि अनेक क्रियाओंमें शक्ति भी रखते हैं, प्रतीत होते हैं, किन्तु गौणतासे। जो शब्द जिस अर्थमें विशेष रूपसे रहता है, वही उसका प्रधान अर्थ है। इस न्यायसे आख्यात भी क्रिया और कारक दोनों अर्थोंमें रहता है, किन्तु क्रियामें विशेष रूपसे और कारकमें सामान्य रूपसे रहता है, इससे यह भावप्रधान है, यह सिद्ध हुआ। इसी बातको इस तरह भी समझ सकते हैं, कि किसीने किसीसे क्रियाके जानने के लिये ही पूछा कि-किं करोति देवदत्तः ? क्या करता है देवदत्त ? इस पर क्रियाके बताने के ही अभिप्रायसे उत्तर देता है—‘पचति’ पाक करता है, किन्तु ‘ओदनम्’ यह पद पहिले कह कर उसके पीछे ‘पचति’ ऐसा नहीं कहता । तात्पर्य । जो शब्द जिस वस्तु के बोध करानेमें दूसरे शब्दकी अपेक्षा से करता है, वह उस पदार्थमें विशेष•प्रत्ययाधान या विशेष रूप