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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 20 of 1282

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हिन्दी निरुक्त । १६ बुद्धिको उत्पन्न करता है। जैसे—'देवदत्त पाक करता है' इस अर्थको कोई पुरुष वाक्यके द्वारा प्रकट करना चाहता है। इसलिये यदि वह 'देवदत्तः' ऐसा कहता है, तो देवदत्तका केवल बोध होता है, किन्तु जिस क्रियाको वह कर रहा है, उसका ज्ञान अभी नहीं होता, इससे जाना गया कि —देवदत्त शब्द पाकानुकूल क्रियाके बतानेमें असमर्थ होकर 'पचति' पदकी अपेक्षा कर रहा है। इससे उस (देवदत्त) शब्दका देवदत्त नामवाले मनुष्यमें ही विशेष प्रत्ययाधान है। किन्तु उस क्रियामें नहीं। यदि वह 'पचति' पदका ही प्रयोग करता है, तो 'पकाता है' इतना ही अर्थ प्रतीत होता है, किन्तु वह कौन है ? यह प्रतीत नहीं होता। सुतराम्, उसे देवदत्त-जो पाक क्रियाको कर रहा है, उसके बतानेवाले देवदत्त शब्दमें आकांक्षा बनी हुई है, इससे 'पचति' पद पाका- नुकूल क्रिया ही में विशेष प्रत्ययाधान करता है, किन्तु द्रव्यमें नहीं। जो शब्द जिसमें विशेष प्रत्ययाधान करता है, उस शब्दका वही मुख्य अर्थ है, अथवा वह शब्द तदर्थ-प्रधान होता है। इसी न्यायसे "भावप्रधान-माख्यातम्" यह सिद्धान्त सिद्ध होता है। आख्यात में । हम जिस क्रियाकी प्रधानताका निरूपण कर रहे हैं, वह अमूर्त है, उसका स्वतन्त्र शरीर नहीं है। जब कभी उसको दिखाना चाहेंगे, तो पाचक, भात, तथा बटलोई आदि साधनोंमें जब होती है, उनके द्वारा ही उसका निर्देश करेंगे, अर्थात् उन्हीं में रधनेके समय कहेंगे कि—यह पाक क्रिया है अन्यथा उस शरीर-रहित क्रियाको नहीं दिखा सकते। इस लिये ही आख्यात पदके साथ 'ओदनम्' 'देवदत्तः,--इत्यादि कारक जो उसकी क्रियासे सम्बन्ध रखते हैं, बोले जाते हैं। यदि आख्यात में क्रियाकी प्रधानता न होती, किन्तु किसी द्रव्य आदिकी होती, तो आख्यात पद ( 'पचति' आदि) के साथ