निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextश्रीहरिः शरणम् । हिन्दी-निरुक्त । भाष्यकार की प्रतिज्ञा ( नि० ) समाम्नायः समाम्नातः, स व्या- ख्यातव्यः । समाम्नायका समाम्नान या क्रमपूर्वक संग्रह हो चुका है, इस- से उसका व्याख्यान होना चाहिये— 'समाम्नाय' नाम "गो" आदि "देवपत्न्यो" पर्यन्त १७७० शब्दों है, जो पांच अध्यायोंमें पढ़े गये हैं, यद्यपि 'समाम्नाय' नाम वेद ही प्रसिद्ध है, तथापि व्युत्पत्तिके बलसे उन साधारण शब्दों लिये भी यह शब्द आसक्ता है, जो किसी मर्यादासे पढ़े गये हों। समाम्नायते मर्यादयाऽभ्यस्यते इति समाम्नायः । "अग्निमीळे" इत्यादि वेदके शब्दोंका पाठ कल्पकल्पाऽन्तरोंमें न बदलकर एकही क्रमपर रहता है। इसीसे (क्रमकी महिमा [क]रण ही) उनमें समाम्नाय शब्द योग वशसे आकर भी रूढ़ या, सुतराम् वैदिक शब्दोंको समाम्नाय शब्दसे व्यवहार करना चित ही है, किन्तु इन साधारण शब्दोंका पाठ संग्रहकर्ताओंकी नुसार समय समय पर भिन्न भिन्न मर्यादाओंसे होता है, इस- इन शब्दोंमें योगार्थभावसे ही समाम्नाय शब्द आता है। अतिरिक्त यह भी एक बात है कि इस समाम्नायमें जितने शब्द