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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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अं० १ पा० १ ख० १ । संग्रह किये गये हैं वे सब वेदके मध्यसे चुने गये हैं। इससे वेदके ही अङ्गभूत होनेसे उससे भिन्न नहीं और उसके समाम्ना' नामके भागी भी बनते हैं । व्याख्यानयोग्य शब्द । भाष्यकार केवल उन्हीं शब्दोंकी व्याख्या करना नहीं चाहते, पञ्चाध्यायी या निघण्टुमें ही पठित हैं, बल्को उनकी भी, जो इनसे अतिरिक्त मन्त्रोंमें ही पढ़े हुए हैं, या अन्य निरुक्तोंमें संग्रह कि गये हैं। यदि आचार्य्य अन्य शब्दोंकी व्याख्या करना नहीं चाहते, निर्वचन का लक्षण नहीं करते, तथा "मृग" "कर्ण" और "दक्षिण। आदि शब्दोंका निर्वचन नहीं करते । इसीसे उनकी व्याख्या करने की इच्छा विस्तृत विषयको अवलम्बन करती है, ऐसा प्र होता है । पठनीय शब्दोंका संग्रह क्यों नहीं ? जब कि १७७० शब्द के अतिरिक्त बहुत शब्द ऐसे हैं जिन व्याख्या करनी चाहिये, तो उन शब्दोंका इस समाम्नायमें संग्रह नहीं किया ? ऐसे शब्द जिनकी कि व्याख्या होनी चाहिए, अनन्त या संक रहित हैं, इसीसे उनके संग्रहकी इच्छासे प्रवृत्ति की जावे तो ग्रन्थ समाप्ति ही न होगी, और उनका अध्ययन अथवा श्रवण भी न हो सकेगा, सर्वथा ऐसी प्रवृत्ति निष्प्रयोजन होती है । भाव यह है कि वे मेधावी छात्र—जिन्होने वेद पढ़ लिए जो तपस्वी और लक्षण, विनियोग, अर्थ, छन्द तथा दैवत निदान या रहस्यके जान नेवाले हों, लक्षण व कुछ कठिन इ उदाहरण से ही अन्य शब्दोंके अथ की ऊहा भी कर सकेंगे, ** इतने परिमित शब्द ही संग्रह किये हैं।