BharatKosha
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 29 of 1282

Read in context
Page 29

२८ अ० १ पा० १ ख० १ । जहां शब्द है वहां उसका वाच्य अर्थ है, क्यों कि—शब्द और अर्थ दोनों वाच्य-वाचक।सम्बन्धसे नित्य सम्बन्धी हैं, इस रीति से सिद्ध हुआ कि नाम में क्रिया है। नाममें रहती हुई भी क्रियाकी अविवक्षा। नाममें जो धातु रहता है, उसकी क्रियाको कहनेकी शक्ति कृत् प्रत्ययसे बने हुए प्रातिपदिकसे तिरस्कृत हो जाती है। अर्थात् उसकी वृत्ति प्रातिपदिकके भीतर ही लय हो जाती है, ऐसी अवस्थामें अपने अर्थको प्रगट करनेमे असमर्थ होकर प्रातिपदिक- के अर्थका ही अनुसरण करता है। इस लिए वह द्रव्यप्रधान ही हो जाता है, और क्रियाकी विवक्षा नहीं रहती। यह भाव है कि-जिस समयमें नामका विग्रह करते हैं, उस समय धातु प्रातिपदिकके बन्धनसे मुक्त होकर द्रव्यमें रहते हुए अपने अर्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु विग्रहसे पहिले नही, यही नाम शब्दकी द्रव्यपरता है। जिस प्रकार राजाकी शासन शक्ति परराष्ट्र- में तिरस्कृत हो जाती है और उसकी सीमासे बाहिर होते ही उसकी शक्तिका उद्दीपन हो जाता है, वैसेही नामके भीतर आये हुए धातुकी शक्तिका वृत्त है। आख्यातमें क्रिया और नाममे द्रव्यका राज्य है। श्लोकोंमे नामके लक्षण। शब्देनोच्चारितेनेह, येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं, नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥ अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते, नानार्थेषु विभक्तयः । तन्नाम कवयः प्राहु, र्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥ २ ॥

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · Page 29 of 1282 · BharatKosha