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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 30 of 1282

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हिन्दी निरुक्त । २६ निर्देशः कर्म करणं, प्रदानमपकर्षणम् । स्वाम्यर्थोप्यधिकरणं, विभक्त्यर्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥३॥ १—लक्षण, जिस शब्दके उच्चारण करनेसे द्रव्य प्रतीत हो, उस को शब्दशास्त्रमें नाम कहते हैं । २—लक्षण, जिस शब्दमें भिन्न २ अर्थोंमें ८ विभक्तियां होती हों और वचनं तथा लिङ्गका भेद हो, उसको नाम कहते है। विभक्तियोंके अर्थ । १ माका, शब्द निर्देश, २ याका कर्मकारक, ३ याका कर्तृ और करण कारक, ४ र्थीका सम्प्रदान कारक, ५ मीका अपादान कारक, ६ ष्ठीका स्वामिभाव आदि सम्बन्ध और ७ मीका अधिकरण कारक अर्थ है। 'नामानि' बहुवचनका कारण । “सत्वप्रधानानि नामानि” इस नाम लक्षणमें “क्रियाप्रधान- माख्यातम्” इस लक्षणमें 'आख्यातम्' पदके समान 'नामानि' के स्थानमें 'नाम' यह एक बचन ही देना चाहिये था, तथापि बहुव- चन करनेका प्रयोजन यह है कि-कही निपात और उपसर्गोंमें भी स्त्रीलिङ्ग, पुलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गोंका भेद देखा जाता है, इसलिए उनका भी नामोंमें संग्रह करनेके लिए बहुबचन दिया है । अन्य आचार्योंके मतमें नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद । कोई आचार्य नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद इस प्रकारसे करते हैं, कि—भाव, काल, कारक और संख्या ये चार अर्थ आख्या- तके हैं, और उनमें भावकी प्रधानता है, इसीसे आख्यातको भाव प्रधान कहते हैं। एवम् नामके भी सत्ता, द्रव्य, संख्या और लिङ्ग ये चार अर्थ होते हैं। और उनमें द्रव्य प्रधान होता है, इसीसे नाम सत्वप्रधान कहे जाते हैं।

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