निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context३० अ० १ पा० १ ख० १ । नाम और आख्यातके समुदायमें भावकी प्रधानता । (नि०) - तद्यत्रोभे भावप्रधाने भवतः । जहाँपर नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होजाते हैं, वहां भाव- की ही प्रधानता रहती है । यद्यपि स्वतन्त्रताकी अवस्था में एक भावप्रधान और दूसरा द्रव्यप्रधान है, तथापि वह प्रधानता एक पदके विचार तक ही रहती है, लोक तथा वेदमे इनसे जब कार्य निकलता है, तो दोनोंके मेलसे ही निकलता है, अर्थात् व्यवहार स्थलमें इनमें से एकके बिना एक नहीं रहता है, सुतराम्, दोनोको परस्परकी अत्यन्त अपेक्षा बनी रहती है । जैसे—व्यवहारमें 'पचति' से भी कुछ प्रयोजन नहीं मालूम होता, और ऐसे ही एक 'देवदत्तः' पदसे भी । इससे ये दोनो जहां इकट्ठे रहेंगे, वहां, अर्थात् वाक्यमें भावकी प्रधानता और द्रव्यकी गौणता रहेगी । क्योंकि—क्रिया-साध्य होती है, और कारक जो द्रव्य है, वे उसके साधनके लिए होते है । इस उपरि लिखित व्याख्यानसे वाक्यमें आख्यातकी प्रधानता सिद्ध हुई । आख्यातमें भावकी अवस्था । (नि०) पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे । व्रजति-पचति--इत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम् । भावकी दो अवस्था होती है, एक साध्यावस्था जो उसके बनते हुएकी असम्पूर्ण अवस्था कही जा सकती है । दूसरी सिद्धावस्था होती है, जिसको उसकी सम्पूर्ण होनेकी अवस्था कह सकते हैं । इनमें भावकी पहिली अवस्था आख्यातसे कही जाती या प्रतीत होती है । शब्द और अर्थका जो सम्बन्ध है, वह लोक व्यवहारसे ही