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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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हिन्दी निरुक्त । ३१ ग्रहण किया जाता है। क्योंकि मनुष्य लोकमे रहकर लोकही से शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसलिए यहां भावकी अवस्था दिख- लानेके लिए भी लोकही अवलम्बनीय है। आख्यात नाम 'पचति-पठति' इत्यादि तिङन्त पदोंका है। भाषामें इनकी जगह 'पकाता है-पढ़ता है' इत्यादि धर सकते हैं। इन पदोंका स्वभाव है कि—जबसे क्रियाका आरम्भ होता है, वहांसे लेकर उसकी समाप्ति तक जो अवस्था है, वह आख्यात पदसे प्रका- शित की जाती है। उदाहरण में हम 'गङ्गां व्रजति' यह वाक्य रखते हैं। जिसका अर्थ 'गङ्गाको जाता है-यह होता है। यहां पर 'व्रजति' से जो क्रिया प्रतीत होती है, उसको गमन कहते हैं। इस गमन क्रियाका आरम्भ जूतीके पहिननेसे होता है, अर्थात् जूती का पहिनना, आगे पीछे पैरोका धरना, मार्गमे भोजन करना, सोना, बैठना तथा जलपान करना आदि क्रियाओमे गमन ही व्याप्त हुआ दिखाई देता है, जब तक वह गङ्गा तक पहुंचे। अर्थात् चलते, बैठते, खाते, पीते हुए भी पूछते है कि क्या करता है, तो उसका यही उत्तर मिलता है, कि—गङ्गाको जाता है। सार यह निकला कि—घरसे गङ्गातक जितनी क्रिया देवदत्तके शरीरमें होती हैं, उन सभीमे गमन क्रिया व्यापक रूपसे प्रतीत होती है। जब वह गङ्गाके ऊपर पहुँच जाता है, तब वह गमन क्रिया सम्पूर्ण हो जाती है। उस अवस्थामें यदि पूछा जाय तो 'व्रजति' इस पदसे उत्तर नहीं दिया जायगा, किन्तु 'गतः-प्राप्तः' इत्यादि पदोंसे ही उत्तर दिया जायगा। क्योकि-अब वह गमन करता नहीं किन्तु कर चुका। इसीसे स्पष्ट होता है कि—आख्यात पद क्रिया की साध्यवस्थाको ही कथन करता है। ऐसे ही पचन तथा पठन क्रियाओंका भी आरम्भ और समाप्ति एवम्, आख्यातके वाच्यार्थ को निर्णय करना होगा।