निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context३२ अ० १ पा० १ ख० १ । अन्त्य क्रियासे भावकी सिद्धि । यहांपर ऐसी आपत्ति उठाई जा सकती है कि जब हम अन्त्य क्रियाके पास ही भावकी सिद्धिको देखते हैं, तो क्यों नहीं अन्तकी क्रिया ही आख्यातका वाच्य समझा जाय ? यद्यपि जिस पदविहरणसे देवदत्त गङ्गाके तटपर पहुंचता है, ठीक उसी पदविहरण (पैड) पर भावकी सिद्धि प्रतीत होती है, तथापि जिस क्रियासे गङ्गाके तटपर पहुंचता है, यदि उससे पहलेकी क्रियाएं न हों तो उसीका होना असम्भव हैं, इसीलिए गृहके त्याग और गङ्गाकी प्राप्ति तक जितनी क्रिया है, सभीमें गमन की व्याप्ति माननी होगी। इसके अतिरिक्त गृह और गङ्गाके मध्य देशमें खान, पान आदि क्रियाओके समय भी 'किङ्करोति' का उत्तर 'गङ्गां व्रजति' यही मिलता है जब कि अन्त्यक्रियाका जन्म भी नहीं है, तो किस प्रकारसे अन्त्य क्रियाको ही आख्यातका वाच्य कह सकते है । तात्पर्य यह है कि-आरम्भ से जितनी क्रियाए होती हैं, उनसे कुछ २ भाव सिद्ध होता रहता है, किन्तु उसकी पूर्त्ति अन्त्य-क्रिया ही में होती है, इससे वह अन्त्यक्रियासे ही सिद्ध हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में उन सभी क्रियाओम्मे जो आरम्भसे अन्ततक होती है, भावकी सिद्धि होती है। यद्यपि वृक्षका पूर्ण स्वरूप फलपाक पर ही प्रतीत होता है किन्तु अङ्कुरसे आदि लेकर उसकी जितनी अवस्था हो चुकी है सभीकी कारणता माननी होगी। वही प्रकार इस प्रकरण मे है। प्रसिद्धिसे भावकी अनेक क्रियाश्रितता । मार्ग के मध्यमें जाते हुए किसी मनुष्यको देखो कि-वह गमन के कुछ भागको कर चुका है, कुछ कर रहा है, और कुछको करेगा, किन्तु कहनेवाले उन भूत भविष्यत् तथा वर्तमान क्रियाओं को एक