निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context, हिन्दी निबन्ध । ४१ ऐसी स्थितिमें नाम, आख्यात, निपात और उपसर्ग चारों ही एकसाथ वर्तमान रहते हैं इसलिए उनकी गणना जो हमारे मतमें है युक्ति-सम्पन्न है । इस मतमें शब्द नित्य है इससे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, अभि- व्यक्ति (प्रकटता) होती है, जैसे—नवीन मृन्मय पात्रमें जलके योग से गन्ध और निर्वात देशमें व्यजनके हिलानेसे वायु प्रकट होता है, किन्तु उत्पन्न नहीं, ऐसे ही वायुके ताल्वाद्यभिघातसे शब्द व्यक्त होता है उत्पन्न नहीं । सुतराम्, पदकी चतुष्ट्व संख्याकी उपपत्ति इस मतमें अच्छी रीतिसे होजाती है । । गोविषाणके दृष्टान्तसे परस्पर पदोंके गौणमुख्यभावका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योकि एककालम उत्पन्न होनेवाले मन्त्रिपुत्र और राजपुत्रका गौणमुख्यभाव देखा जाता है अतः नामकी आख्यातमें गौणता और उसकी उसमें मुख्यता युक्ति संगत है । शास्त्रकृत योग, जो धातु उपसर्ग तथा आगम, आदेश आदिका परस्पर सम्बन्ध है वह पहिले अयुक्त ठहराया गया है, सोभी ठीक नहीं हैं क्योंकि इस सिद्धान्तके अनुसार पुरुषके अन्तःकरणमें शब्द और उसका अभिधेय (वाच्य) तथा सम्बन्ध ये तीनों बुद्धि रूपसे स्थित रहते है, उन्हीं बुद्धिमय शब्दोंमें व्याकरणके बताये हुए सब विकार होते है, और वास्तविक शब्दोंमें आरोप किये जाते हैं, जब पुरुष किसी अर्थको दूसरेके लिए प्रकाशित करना चाहता है, उस समय उस अर्थके वाचक शब्दको अभिव्यक्तिके लिए अपने आत्माके गुणभूत प्रयत्नसे नाभिदेशसे वायुको प्रेरित करता है, वह वायु उठकर वक्षःस्थल आदि देशमें टकराता हुआ मुखके द्वारसे बाहर आता है, भीतरसे बाहर आनेके ६