निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । ४३ दे सकते हैं, किन्तु शब्द एक ऐसा सूक्ष्म साधन है, जिसके द्वारा थोड़ी देरमें बहुत कुछ समझाया जा सकता है, किन्तु चिन्हों या अभिनयोंमें बड़ा क्लेश तथा गौरव है, इस लिये शब्दके द्वारा वेद शास्त्रके अध्ययन गौरवका आक्षेप निर्मूल है, शब्दके द्वारा जितना और जो कुछ जाना जा सक्ता है और किसी उपाय से भी नहीं, इससे अन्य अन्य उपायोंका भी इसके साथ खण्डन हो गया। वेद और शास्त्रोंके अध्ययनसे ही अभ्युदय (आत्मोन्नति) हो सकता है, उसीके लिये शास्त्रके आरम्भमें यत्न किया जाता है। इन्हीं शब्दोंसे देवताओंके साथ व्यवहार। (नि०) तेषां मनुष्यवद्देवताभिधानम् । यही पद जो नाम आदि भेदसे चार प्रकारके हैं, मनुष्योंके समान देवताओके भी अभिधानमें समर्थ हैं, अर्थात् वेदमें देव- ताओंके अर्थ जो हविः दी जाती है, या उनसे कुछ प्रार्थना की जाती है, तो इन्हीं शब्दोंके द्वारा होती है। मन्त्रोंका प्रयोजन । (नि०) पुरुषविद्यानित्यत्वात्कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे । वेदमें मन्त्रोंका समाम्नान इसलिये किया गया कि—यदि मनुष्य स्वतन्त्रतासे इन शब्दोंके द्वारा यज्ञमें हविके दान आदि करनेको देवताओंसे व्यवहार करेंगे तो अपने अशिक्षितत्व मन्दशिक्षितत्व तथा विस्मरणशीलत्व दोषसे नाम आख्यात आदिकोंका यथावत् प्रयोग न करेंगे और देवताओंके अपराधी बनेंगे, क्योंकि देवता सब अर्थों- को प्रत्यक्ष देखते हैं, वे थोड़े अयुक्त अभिधानको भी सहन न करेंगे, इसकारण उनके यज्ञको त्याग देनेसे कर्म निष्फल होजायगा,