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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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४५ अ० १ पा० १ खं० २ । और मन्त्रोंमें येही नाम आदि पद विशिष्ट परिपाटीसे पढ़े हुये हैं, उनके द्वारा कर्म करनेसे भूलनेकी त्रुटि नहीं होगी, इसी कर्म-सम्पत्ति- के लिए वेदमें मन्त्र संमाम्नात हुए हैं। नामादिकोंके व्याख्यानका प्रयोजन । सार यह है कि—इन्हीं चारों पदोंसे मन्त्र व्याप्त हैं, अर्थात् पद चतुष्टयही परिपाटी विशेषसे पढे हुवे मन्त्र कहाते हैं, इससे इनके ज्ञान द्वारा मन्त्रार्थका ज्ञान होसकता है। इसीलिए हमने इनका लक्षण उदाहरण द्वारा बोध कराना आरम्भ किया है। लक्षणकी आवश्यकता । यदि लक्षणका अनादर कर शब्दोंकी गणना कीजावे तो उनके अनन्त होनेसे वह हो न सकेगी और न ग्रन्थही पूर्ण होसकता है, तथा अध्येताकी शक्ति भी क्षय होजायगी, विद्वानोंने पदार्थोंके लक्षण द्वाराही उनका अन्त प्राप्त कियाहै। अतः हम भी उक्त प्रयो- जनके लिए लक्षणका अवलम्बन करते हैं। भावके सामान्य व विशेषरूपके दिखानेके अनन्तर पदकी अनि- त्यतासे उठे हुए प्रश्न तथा अन्य २ जो कुछ दिखाया गयाहै, वह प्रसङ्गवशसे कहागयाहै, अब फिर भावके सम्बन्धमें ही जो रहगया है उसे दिखाते हैं। भावके दो रूप हैं एक कार्य और दूसरा कारण । अब तक भावके सम्बन्धको लेकर जो दिखाया गयाहै, वह कार्य भावका है, अर्थात् क्रियासे बननेवाला वस्तु भावहै, अथवा क्रियाही भावहै। अब कारणस्वरूप भावका निरूपण किया जाताहै । प्रलयकालमें जब पुरुषोंके सुख-दुःखके उपभोगका प्रवाह बन्ध होजाता है, तब क्रिया और द्रव्य अपने २ विशेषोंको त्यागकर, कार्यात्मतासे अतीत (पार) होकर एक अविशिष्टरूपसे स्थित होजाते हैं, जिसको हम सत्तामात्रसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्म-भाव