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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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कह सकते हैं। अर्थात् अत्यन्त अविनाशधर्मवाला आत्मांही भाव पदार्थ है। इस कारण भूतभावका प्रसङ्ग यहां पर इसलिए आया कि— जगत्के स्थितिकालमें इसी भावके विकार द्रव्य, गुण, तथा कर्म- के रूपमें होकर नाम, आख्यात उपसर्ग और निपात इन चतु- र्विध पदोंसे बोले जाते हैं; और स्वयम् वह भी (भाव) सब विशेषोंसे रहित तथा होने मात्र (सत्तामात्र) क्रियासे सम्बन्ध रखता हुआ उपपद रहित 'भवति' एवम् 'भावः' इन दोनोंसे बोला जाताहैं ! अर्थात् कारण भावके वाचक ये दो पद हैं, और कार्य भावके 'पचति-पठति-गौः-अश्वः' इत्यादि सम्पूर्ण पद। इस प्रकार 'भवति' और 'भावः' इन दोनोंकी वृत्तिके विवेचनार्थ ही उक्त भाव- का प्रसङ्ग लाया गया है। पूर्वपक्ष। सांख्याचार्य कहते हैं कि—जो तुमने कारणभूत भाव बताया है, वह हमारा प्रधान या मूल प्रकृति है, किन्तु आत्मा नहीं ? खण्डन। प्रधान या प्रकृति भी उस भावका विकार ही है, किन्तु भाव नहीं, क्योंकि वह प्रधान-भाव नामसे बोला जाताहै, जिस वस्तुके बतानेके लिए 'भाव' पदके साथ विशेषण जोड़ा जायगा, वह भाव नहीं, भावका विकार ही रहेगा। कोई सांख्य कहते हैं कि—वह भाव पुरुष है, किन्तु पुरुष इस लिए नहीं कहा जा सकता कि—उनके मतमें उसमें कोई शक्ति स्वीकार नहीं की जाती अर्थात् वह 'प्रकृति-विकृति'-भाव-शून्य है। और हमारे भावमें शक्ति है, जिसके कारण उससे सब जगत उत्पन्न होता है। इसी रीतिके अनुसार ईश्वर तथा परमाणु आदि वस्तुओंको