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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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४६ अ० १ पा० १ ख० २ । भाव बताने वाले भी अपना पक्ष हार गये, क्योंकि—उनके अभिमत पदार्थ 'ईश्वर-भाव' तथा परमाणु-भाव' आदि शब्दोंसे बोले जातेहैं। कोई उस भावको शून्यरूप बताते हैं, किन्तु उनका कहना भी ठीक नहीं, जिससे कि, शून्य शब्दमें भी भाव शब्दका सम्बन्ध आजाता है। प्रयोजन यह है कि, अर्थके बिना कोई शब्द बोला नहीं जाता, शब्द अपने अर्थके साथ सम्बद्ध रहता है, जैसे कि— 'कुछ वह है ? जो शून्य है'। क्यों कि लोकमें भी ऐसा प्रसिद्ध है—'गृहं-शून्यम्' 'ग्रामः शून्यः' 'शून्यशब्द-महत्वे' । इससे यह नहीं कहा जा सकता कि 'शून्य' शब्द अभाव ही को बताता है, किन्तु उसको किसी भावकी अपेक्षा रहती है। फलित यह निकला कि—सब उपपदोंसे रहित जो भवति पद है, उससे जिस भावकी प्रतीति होती है, उसके रूपसे जगत् नित्य है, और अन्य भाव विकार, जो परमाणु आदि हैं, उन सबके रूपमें जगत् अनित्य है। जिस भावमें सत्तामात्रके सम्बन्धसे सभी भाव विकार सदा दूर रहते हैं, उस भावको वेही पुरुष जान सकते हैं, जिन्होंने वेदान्त का रहस्य जान लिया है, एवम् पर अवरके जाननेवाले, आत्मा व वेदके अभिज्ञ, एवं तपः सम्पत्ति आदि अनेक उत्तम गुणोंसे अलङ्कृत तथा आत्मतत्वकी कामनावाले हैं, किन्तु प्रधान आदिके वादमें अभिरत रहनेवाले पुरुषोको ऐसाज्ञान होना असम्भवहै। यह इस सामान्य व विशेष रूपसे शब्दोंके निर्वचन प्रंसगमे कृदन्त भू धातुके वाच्यार्थ बताने को ब्राह्मणोंने वेद रहस्य दिखाया है। वार्ष्यायणि के मतमें भाव विकारोंके भेद। (नि०) “षड्भावविकाराभवन्ति इति वार्ष्यायणिः जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति।”