निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । ४७
“जायते-इतिपूर्वभावस्यादि माचष्टे, नापर भावमाचष्टे. न प्रतिषेधति॑ ।” वार्ष्यायणि आचार्य कहते हैं कि-जैसे-मनुष्य शरीरकी अवस्था बाल्य यौवन तथा वार्द्धक (बुढ़ापा) रुपसे अनेक भागोंमें बटी हुई है, उसी प्रकार भावकी विकारावस्था भी छः भागोंमें बटी हुई है। जब भाव किसी रुपमें विकृत होता है तो उसके हर एक विकारमें जन्म, सत्व, विपरिणाम, वृद्धि, अपक्षय, एवम् विनाश,-ये छः अवस्था होती हैं। इसके उदाहरणार्थ वे सभी वस्तु ली जा सकती हैं; जो जगत्में स्थावर तथा जङ्गम किसी 'रुपमें भी उत्पन्न होकर नष्ट होजाती हैं। इन सभी अवस्थाओंका यह स्वभाव है कि-वे अपनेसे पहिले भावकी अवस्थामें अल्प अल्प मात्रामें बनने लगती हैं, और उसके समयके बीतजाने पर अपना पूरा प्रकाश करती हैं। ध्यानसे देखने पर विदित होगा कि घटके बननेके समय उसकी जन्मावस्था होती है, उस समय उसको 'जायते' या 'जन्मता है' ऐसे क्रियापदसे व्यवहार किया जाता है, किन्तु बन चुकनेसे पूर्व उसे 'घट है' इस वाक्यसे नहीं बोलते, यद्यपि कुछ या घट है नहीं, तो उस अवस्थामें 'घट जन्मता है' ऐसा भी किस आधार पर बोल सकते हैं, इस लिए यह मानना होगा कि-उसकी कोई अव्यक्त या अधूरी अवस्था है, वह पूर्ण न होने तक वैसे वाक्य से व्यवहार नहीं किया जायगा, और न उसका निषेध ही कर सकते हैं। इस प्रकार प्रथम भाव विकार और उसके समय दूसरे सत्तारूप भाव-विकारकी वर्तमानता को सूक्ष्म दृष्टिसे देखना चाहिए। दूसरा भाव विकार और उसमें तीसरे भावका आरम्भ। (नि०) अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्त्वस्यावधारणम् । जब पहिला भाव विकार या अवस्था पूरी होलेती है, जिसको