निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context५२ अ० १ पा० १ ख० २ । इन छः भावविकारोंके अतिरिक्त और भी बहुत भावविकार हैं, और वे सब परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं, किन्तु उन सबकी उत्पत्ति पूर्वोक्त जन्म आदि छः भावोंसे ही होती है, इससे इनका उन्हींमें अन्तर्भाव होता है। इस कारण पहिले भावविकारोंकी जो गणना की है, वही स्थिर है, उससे न्यून या अधिक नहीं हो सकती । भाव-विकारोंके भेद । 'जनि' धातुका जन्म अर्थ है, यह पहिला भावविकार है, इसके अनेक भेद हैं और उनके वाचक धातु भी अनेक हैं। जैसे—'निष्प- द्यते' 'अभिव्यज्यते' 'उत्तिष्ठति' इत्यादि आख्यातपद निष्पत्ति अभिव्यक्ति तथा उत्थान आदि क्रियाओंके वाचक हैं। ये परस्पर भिन्न होकर भी 'जायते' के अर्थमें सब अन्तर्गत होजाते हैं। ऐसे ही 'अस्ति' के भेद विद्यते (विद्यमानता) भवति (भाव) इत्यादि है। 'विपरिणमते' (विपरिणाम) के भेद 'जीर्यति' (जीर्णता) 'भावान्तर मापद्यते' (भावान्तरापत्ति) इत्यादि । 'वर्धते' (वृद्धि) के 'पुष्यति' (पोषण) 'उपचीयते' (उपचय) और 'अर्थायते' (अर्थ सञ्चय) इत्यादि । 'अपक्षीयते' (अपक्षय) के 'ध्वस्यति' (ध्वंस) और 'भ्रश्यति' (भ्रंश) इत्यादि । तथा 'विनश्यति' (विनाश) के 'म्रियते' (मरण) और 'विलीयते' (विलय) इत्यादि भेद हैं। ये सब भाव विकार जिस प्रकार जिस वचनमें अवस्थित हों, प्रकरण तथा युक्तिसे मन्त्रार्थ के निश्चयके लिए वैसे ही जानने चाहिएँ । •यद्यपि सभी धातु उक्त रीतिसे भाव-विकाररूप क्रियाओंके