निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context· हिन्दी-निरुक्त । ५३ वाचक हैं, इस कारण सबका ही यहाँपर पाठ दिखाना चाहिए था, किन्तु शास्त्रके गौरवके भयसे लक्षणमात्र दिखाया है, इसीसे सब जानने होंगे । इस शास्त्रकी रचनाशैली । इस निरुक्त शास्त्रमें यास्क मुनि जिस बातको दिखाना चाहते हैं, पहिले उसको सूक्ष्म या सामान्य रूपमें कहते हैं, मानों, वह सूत्र है, फिर उसकी वृत्तिके समान संक्षेप व्याख्या और उसकी विस्तृत व्याख्या, जो उसका वार्त्तिकसा होजाता है। इनके क्रमसे 'उद्देश' 'निर्देश' तथा 'प्रतिनिर्देश' यह तीन नाम हैं। इसी रीतिसे सब स्थानोंमें यथासम्भव विभाग जानना चाहिए । उपसर्गका लक्षण । ( अनर्थकत्व-अर्थवत्त्व ) (नि०) न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोग-द्योतका भवन्ति इति ॥ शाकटायन आचार्य्य कहते हैं कि—जिस प्रकार वर्ण-पदसे अलग होकर किसी अर्थके वाचक नहीं होते, उसी प्रकार उपसर्ग भी नाम व आख्यात पदोंके समुदायसे पृथक् पद व वाक्यके रूपमें विरचित होकर अर्थके वाचक नहीं होते, सुतराम्, अर्थोंके साक्षात् कथनमें इनकी शक्ति नहीं है, किन्तु आख्यात पदके साथमें लग कर उसके अर्थ विशेषको द्योतन (प्रकाश) करते हैं । व्युत्पत्ति । उपगृह्य आख्यातं तस्यैव अर्थ-विशेषं सृजन्ति ये, ते उपसर्गाः । जिस प्रकार दीपकके संयोगसे घरमें रखे हुए द्रव्योंको नील पीत