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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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६ अ० १ पा० १ ख० १ । वृत्ति शब्दोंमें अत्यन्त अस्पष्ट ( बेमालूम ) क्रिया होती है। इससे उन्हींके निर्वचनका यत्न यहां किया गया है। निरुक्तमें निर्वचनके पांच उपाय। १—शब्दमें किसी अपेक्षित अक्षरको ऊपरसे जोडना। २—शब्दके अक्षरोंको प्रयोजनानुसार उलट पलट कर लेना। ३—शब्दमें किसी अक्षरके स्थानमें कोई दूसरा अक्षर कर देना। ४—शब्दमें किसी अनावश्यक अक्षरको उसमेंसे हटा देना। ५—शब्दमें अर्थके अनुसार धातुके अर्थको कल्पित कर लेना। जिस प्रकार निगन्तु शब्दसे निघण्टु शब्दका निर्वचन दिखाया गया, उसी प्रकार अन्य अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंका भी निर्वचन जानना होगा। व्याकरणके उणादिगणमें अतिपरोक्षवृत्ति शब्द ही व्युत्पा- दित होते हैं। वहां जिन शब्दोंका लक्षण नही किया है, उन शब्दोंका शब्दके अनुसार यहां लक्षण कल्पित करना होगा क्यो कि—"उणादि शब्द अपरिसमाप्त है" यह शब्दतत्वके लक्षण जाननेवालोंने प्रति- ज्ञा की है। सर्वथा ही जिन शब्दोंमें कोई कल्पना नहीं हो सकती हो, उनकी सिद्धि व्याकरणके पृषोदरादिगणमें पाठ माननेसे जाननी होगी। क्यों कि, वहां जिस रूपमें जो शब्द पढे गये हैं, वे उसी रूपमें साधु वा शुद्ध माने गये हैं, यही लक्षणके जाननेवालोंका सिद्धान्त है। प्रकारान्तरसे निर्वचनः— (नि०) अपि वा हननादेव स्युः । अथवा आहनन या पठन क्रियाके सम्बन्धसे ही ये शब्द निघण्टु हो सकते हैं। अर्थात् पञ्चाध्यायी ग्रन्थके रूपमें पठित होनेसे ही ये निघण्टु हैं। कैसे ? (नि०) समाहता भवन्ति । समाहताः समाहन्तवः निघण्टवः । यहां 'समाहत' शब्द प्रत्यक्षवृत्ति 'संमाहन्तु' शब्द परोक्षवृत्ति