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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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हिन्दी निरुक्त। ७ और 'निघण्टु' शब्द अतिपरोक्षवृत्ति है। अर्थ यह हुआ कि इस पञ्चाध्यायी रूप ग्रन्थमें ये गवादि शब्द मर्यादासे पढ़े हुये हैं। इसीसे समाहत समाहन्तु या निघण्टु कहे जाते हैं। समाहत शब्दसे समा- हन्तु और उससे निघण्टु शब्द बन गया है। अर्थात् 'सम्' उपसर्गके बदलेमें 'नि' उपसर्ग 'आङ्' (आ) उपसर्ग का लोप और 'हन्'- धातुके 'ह' को 'घ' होना विशेष है। इस पक्षमें 'आङ्' का अर्थ मर्यादा और 'हन्' का अर्थ पढ़ना है। धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं, इससे ऐसा अर्थ करना अनुचित नहीं है। इसके अतिरिक्त लोकमें भी 'आङ्' पूर्वक 'हन्' धातुका पठन अर्थ में प्रयोग देखा जाता है। जैसे: - १-ब्राह्मणे इदमाहतम्—ब्राह्मण (ग्रन्थ) में यह कहा है। २-सूत्रे इदमाहतम् सूत्र में यह कहा है। इन दोनों वाक्योंमें 'आहत' शब्द उक्त या पठित शब्दका पर्याय है। 'निघण्टु' शब्दकी पहिली व्याख्यामें जो कि--निगन्तु शब्दके द्वारा की गई है, व्याख्येय 'निघण्टु' शब्दमें व्याख्यान 'निगन्तु' शब्दकी अक्षरों और अर्थ दोनोंसे ही तुल्यता है, इससे वह व्याख्या उभयप्रधान कही जासकती है, किन्तु इस द्वितीय व्याख्यामें 'निघण्टु' शब्दके साथ 'समाहत' शब्दकी अर्थसे ही समता है, वर्णसमता का बिलकुल ही अभाव है, इसलिये इसी व्याख्याको अर्थ-प्रधान समझी जायेगी। निरुक्त शास्त्रमें उक्त दोनो ही प्रकार की व्याख्या मानी गई है, उभयप्रधान व्याख्याके अभावमें अर्थ-प्रधान व्याख्या कीजावेगी अथवा किसी आवश्यकता पर— अन्य प्रकार की व्याख्या। (नि०) यद्वा समाहृता भवन्ति । अथवा समाहरण (इकट्ठा करना) क्रियाके सम्बन्धसे ये शब्द निघण्टु हैं। कैसे?