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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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१३२ नीतिवाक्यामृतम् इन्द्रियात्ममनोमरुतां सूक्ष्मावस्था स्वापः ॥ २० ॥ इन्द्रियां, आत्मा, मन और प्राण-वायु का सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त हो जाना अर्थात् मन्दशक्ति हो जाना शयन है । यथासात्म्यं स्वापाद् भुक्तान्नपाको भवति प्रसीदन्ति चेन्द्रियाणि ॥२१॥ प्रकृति के अनुकूल पूर्ण निद्रा होने से खाया हुआ अन्न पच जाता है और समस्त इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं । अघटितमपिहितं च भाजनं न साधयत्यन्नानि ॥ २२ ॥ टूटे और बिना ढके हुए पात्र में अन्न नहीं पकता । इसका आशय यह है कि शरीर यदि श्रम से चूर-चूर हो रहा हो और निद्रा से उसकी सुरक्षा न की जाय तो अन्न का परिपाक नहीं होगा । प्रथमं नित्यस्नानं, द्वितीयकमुत्सादनं, तृतीयकमायुष्यं चतुर्थकं प्रत्यायुष्यमित्यहीनं सेवेत ॥ २३ ॥ प्रथम नित्यस्नान, द्वितीय सुगन्धित तैल का अथवा उबटन का शरीर में मर्दन, तृतीय आयुर्वर्धक सात्विक और पौष्टिक पदार्थों का सेवन, चतुर्थ मल- मूत्रादि का समय से विसर्जन आदि में नागा न करे । धर्मार्थकामशुद्धिदुर्जनस्पर्शाः स्नानस्य कारणानि ॥ २४ ॥ धार्मिक कार्यों का अनुष्ठान, उत्साहपूर्वक अर्थोपार्जन, प्रसन्नतापूर्वक काम- चेष्टाओं में प्रवृत्ति, शरीरशुद्धि और दुर्जनों के स्पर्शमात्र से उत्पन्न दोषों को दूर करना इन कारणों से स्नान किया जाता है । श्रमस्वेदालस्यविगमः स्नानस्य फलम् ॥ २५ ॥ थकावट, पसीना और आलस्य का दूर हो जाना स्नान का फल है । जलचरस्येव तत्स्नानं यत्र न सन्ति देवगुरुधर्मोपासनानि ॥ २६ ॥ स्नान के अनन्तर यदि देवता, गुरु और स्वधर्म सम्बन्धी कोई उपासना न की जाय तो वह स्नान जल में रहनेवाले जीव मत्स्य मगर आदि के स्नान के समान व्यर्थ है । प्रादुर्भवत् क्षुत्पिपासोऽभ्यङ्गस्नानं कुर्यात् ॥ २७ ॥ जब भूख और प्यास प्रतीत हो तब मनुष्य को समस्त अङ्ग में तैल मर्दन करने के अनन्तर स्नान करना चाहिए। आचार्य प्रवर का आशय है कि जब भूख और प्यास मालूम पड़ने लगे तब स्नान का समय जानकर तैल मर्दन करने के अनन्तर स्नान करे । आतपसंतप्तस्य जलावगाहो दृङ्मान्द्यं शिरोव्यथां च जनयति ॥२८॥