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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३३ सूर्य के आतप से संतप्त व्यक्ति यदि तुरन्त, बिना विश्राम किये ही स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और शिर में पीड़ा होती है । बुभुक्षाकालो भोजनकालः ॥ २९ ॥ भोजन का उचित समय वही है जब कि मनुष्य को भूख लगे । अक्षुधितेनामृतमप्युपभुक्तञ्च भवति विषम् ॥ ३० ॥ बिना भूख के खाया गया अमृत भी विष हो जाता है । जठराग्निं वज्राग्निं कुर्वन्नाहारादौ वज्रकं वलयेत् ॥ ३१ ॥ जठराग्नि को कठोर से कठोर वस्तु को पचा डालनेवाली बनाने की दृष्टि से भोजन से पूर्व गदा मुद्गर आदि घुमावे । निरन्नस्य सर्वं द्रवद्रव्यम् अग्निं नाशयति ॥ ३२ ॥ भोजन के समय बिना अन्न के केवल घी, दूध अथवा चाय, शरबत मात्र पीने से जठराग्नि नष्ट हो जाती है । अतिश्रमपिपासोपशान्तौ पेयायाः परं कारणमस्ति ॥ ३३ ॥ अत्यन्त श्रम करने के अनन्तर बारम्बार लगने वाली प्यास की शान्ति के लिये मण्डपान ( चावल का माड़ पीना ) सर्वोत्तम है । घृताधारोत्तरं भुञ्जानोऽग्निं दृष्टिञ्च लभते ॥ ३४ ॥ घृत खाने के अनन्तर भोजन करने से मनुष्य की जठराग्नि दीप्त होती है और दृष्टि अर्थात् नेत्र की ज्योति बढ़ती है । सकृद् भूरिनीरोपयोगो वह्निम् अवसादयति ॥ ३५ ॥ एक वार ही बहुत जल पी लेने से जठराग्नि नष्ट हो जाती है । क्षुत्कालातिक्रमादन्नद्वेषो देहसादश्च भवति ॥ ३६ ॥ भूख लगने पर भोजन न करने से अन्न से अरुचि हो जाती है और देह में शिथिलता आती है । विध्मापिते वह्नौ किं नामेन्धनं कुर्यात् ॥ ३७ ॥ अग्नि बुझ कर जब राख हो जाय तब उसमें ईंधन क्या करेगा ? मनुष्य को जब खूब भूख लगी हो तब वह यदि भोजन नहीं करता तो उसकी जठ- राग्नि शान्त हो जाती है । अनन्तर भोजन करने से वह नहीं पचता । यो मितं भुङ्क्ते स बहु भुङ्क्ते ॥ ३८ ॥ जो थोड़ा खाता है वह बहुत खाता है । अर्थात् स्वल्प भोजन सदा सुख कर और दीर्घायु दाता होता है । अप्रमितम्, असुखं, विरुद्धम्, अपरीक्षितम्, असाधुपाकम्, अतीत- रसम्, अकालं चान्नं नानुभवेत् ॥ ३६ ॥ बिना मात्रा का, अहित कर, अपनी प्रकृति के प्रतिकूल, बिना परीक्षा

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