नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in context१३६ नीतिवाक्यामृतम् रसायनों का सेवन करने से मनुष्य का बुढ़ापा और रोग दूर होकर सुन्दर स्वास्थ्य बना रहता है इसी तरह स्वतन्त्र रहने पर भी मनुष्य स्वस्थ रहता है । यथाकामं समीहमानाः किल काननेषु करिणो न भवन्त्यास्पदं व्याधीनाम् ॥ ५९ ॥ जङ्गलों में स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाले हाथी रोगी नहीं होते । सततं सेव्यमाने द्वे एव वस्तुनी सुखाय, सरसः स्वैरालापस्ताम्बूल- भक्षणञ्च ॥ ६० ॥ निरन्तर सेवित दो ही वस्तुएं सुखोत्पादक होती हैं स्वच्छन्दभाव से सरस संलाप और ताम्बूल का भक्षण । चिरायोर्ध्वजानुर्जडयति रसवाहिनीः स्नसाः ॥ ६१ ॥ चिरकाल पर्यन्त घुटनों को उठाकर बैठने से रसवाहिनी नसें जकड़ जाती हैं । सततमुपविष्टो जठरमाध्मापयति, प्रतिपद्यते च तुन्दिलतां वाचि मनसि शरीरे च ॥ ६२ ॥ निरन्तर बैठे रहने से जठराग्नि मन्द हो जाती है और वाणी, मन तथा शरीर स्थूल हो जाते हैं । अतिमात्रं खेदः पुरुषमकालेऽपि जरया योजयति ॥ ६३ ॥ अत्यन्त शोक से बिना समय के ही पुरुष की वृद्धावस्था आ जाती है । नादेवं देहप्रासादं कुर्यात् ॥ ६४ ॥ मनुष्य अपने देहरूपी प्रासाद को देवता से शून्य न रक्खे । अर्थात् मन से ईश्वरभक्ति करे । देवगुरुधर्मरहिते पुंसि नास्ति प्रत्ययः ॥ ६५ ॥ जिस पुरुष में देवता की भक्ति, गुरु के प्रति श्रद्धा और धर्म के भाव नहीं वर्तमान हैं वह विश्वासयोग्य नहीं है । क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषो देवः ॥ ६६ ॥ दुःख, कर्मभोग और ईर्ष्या द्वेष से शून्य पुरुष-विशेष देव हैं । तस्यैवैतानि खलु विशेषनामानि अर्हन्नजोऽनन्तः शम्भुर्बुद्धस्तमो- ऽन्तक इति ॥ ६७ ॥ देवसंज्ञक उसी पुरुष विशेष के अर्हन्, अज, अनन्त, शम्भु, बुद्ध और तमोऽन्तक ( अज्ञान रूप अन्धकार को दूर करने वाला ) यह सब नाम हैं । आत्मसुखानुरोधेन कार्याय नक्तमहश्च विभजेत् ॥ ६८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu