नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in contextदिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३७ मैं सुखपूर्वक कार्य कर सकूं इस दृष्टि से अपने विभिन्न कार्यों के निमित्त रात और दिन का निश्चित समय विभाग बना ले । कालानियमेन कार्यानुष्ठानं हि मरणसमम् ॥ ६६ ॥ समय का कोई नियम न रखकर कार्य करना मरण तुल्य होता है। आत्यन्तिके कार्ये नास्त्यवसरः ॥ ७० ॥ अत्यन्त कल्याणकारी अर्थात् धार्मिक कार्यों के लिये कोई नियत समय नहीं है । अवश्यं कर्त्तव्ये कालं न यापयेत् ॥ ७१ ॥ जो कार्य निश्चित रूप से करना ही हो उसमें समय का अतिक्रमण न होने दे । आत्मरक्षायां कदापि न प्रमाद्येत् ॥ ७२ ॥ आत्मरक्षा के कार्यों में कभी भी असावधानी न करे । सवत्सां धेनुं प्रदक्षिणीकृत्य धर्मोपासनं यायात् ॥ ७३ ॥ धर्मोपासना के निमित्त प्रस्थान करने से पूर्व बछड़े सहित गो की प्रद- क्षिणा कर ले । अनधिकृतोऽनभिमतश्च न राजसभां प्रविशेत् ॥ ७४ ॥ अनधिकृत रूप से तथा बिना आज्ञा प्राप्त किये हुए राजसभा में प्रवेश न करे । आराध्यमुत्थायाभिवादयेत् ॥ ७५ ॥ आराध्य पुरुष की वन्दना खड़ा होकर करे बैठे बैठे नहीं । देवगुरुधर्मकार्याणि स्वयं पश्येत् ॥ ७६ ॥ देवता, गुरु और धर्म-सम्बन्धी कार्यों को स्वयं देखे । कुहकाभिचारकर्मकारिभिः सह न संगच्छेत् ॥ ७७ ॥ छल-कपट और धोखा धड़ी का काम करने वालों एवम् मारण-मोहन आदि का कार्य करने वालों की संगति न करे । प्राण्युपघातेन कामक्रीडां न प्रवर्त्तयेत् ॥ ७८ ॥ प्राणियों की हिंसा करके काम क्रीड़ा में न प्रवृत्त हो । जनन्यादिपरस्त्रिया सह रहसि न तिष्ठेत् ॥ ७९ ॥ सम्बन्ध में माता भी लगने वाली पराई स्त्री के साथ एकान्त में न बैठे । नातिक्रुद्धोऽपि मान्यमतिक्रामेदवमन्येत वा ॥ ८० ॥ अत्यन्त क्रोध की दशा में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लङ्घन और अपमान न करे ।