भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१३८ नीतिवाक्यामृतम् नाप्ताशोधितं परस्थानमुपेयात् ॥ ८१ ॥ अपने प्रामाणिक व्यक्तियों के द्वारा परीक्षण कराये बिना शत्रु के स्थान पर न जाय । नाप्तजनैरनारूढं वाहनमध्यासीत ॥ ८२ ॥ प्रामाणिक व्यक्ति जिन पर न बैठ चुके हों ऐसी सवारी पर भी न बैठे। न स्वैरपरीक्षितं तीर्थं सार्थं तपस्विनं वाभिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ अपने आदमियों से परीक्षण कराये विना देवस्थान आदि तीर्थ अथवा यात्री-दल और तपस्वी के पास न जाय । न याष्टिकैरविविक्तं मार्गं भजेत् ॥ ८४ ॥ दण्डधारियों से अपरीक्षित मार्ग पर न जाय । न विषापहारौषधिमणीन् क्षणमप्युपासीत् ॥ ८५ ॥ विष दूर करनेवाली ओषधि और मणि का सेवन क्षणभर के लिये भी न करे । मन्त्रिभिषङ्नैमित्तिकरहितः कदाचिदपि न प्रतिष्ठेत् ॥ ८६ ॥ मन्त्री, ज्योतिषी और वैद्य के बिना कभी भी न रहे । वह्लावन्यचक्षुषि च भोग्यमुपभोग्यं च परीक्षेत ॥ ८७ ॥ अपने भोग और उपभोग की वस्तुओं का परीक्षण अग्नि के द्वारा अथवा अन्य व्यक्ति की दृष्टि से कराले । अमृते मरुति प्रविशति सर्वदा चेष्टेत ॥ ८८ ॥ अपने सब काम सदा 'अमृतसिद्धि' योग में करे । भक्ति-सुरत-समरार्थी दक्षिणे मरुति स्यात् ॥ ८६ ॥ भक्ति कार्य, कामभोग और संग्राम दक्षिण पवन के बहने पर अर्थात् वसन्तऋतु में करे । परमात्मना समीकुर्वन् न कस्यापि भवति द्वेष्यः ॥ ६० ॥ परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेनेवाले से कोई भी द्वेष नहीं करता । मनः-परिजन-शकुन-पवनानुलोम्यं भविष्यतः कार्यस्य सिद्धे- र्लिङ्गम् ॥ ६१ ॥ मन और नौकर-चाकरों का प्रसन्न होना, अच्छे शकुनों का होना तथा अनुकूल वायु का चलना भावी कार्यसिद्धि के लक्षण हैं । नैको नक्तं दिवं हिण्डेत ॥ ६२ ॥ रात-दिन अकेला ही न भ्रमण करे ।