BharatKosha
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

Page 17 of 220

Read in context
Page 17

॥ श्रीः ॥ नीतिवाक्यामृतम् —— मङ्गलाचरणम् सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभवम् । सोमदेवं मुनिं नत्वा नीतिवाक्यामृतं ब्रुवे ॥ १ ॥ कीर्त्तिमान् , कुबेर के समान आकृतिवाले, चन्द्रतुल्य कान्तिवाले तथा सोमवंश में अथवा सोम नामक व्यक्तिविशेष से समुत्पन्न सोमदेव मुनि को नमस्कार कर मैं अमृतमय नीतिवाक्यों को कहता हूँ । विशेषार्थ—उमा शब्द कीर्त्ति का वाचक है उससे संयुक्त जो हो वह सोम अतः सोमं का अर्थ कीर्त्तिमान् है । ग्रन्थकर्त्ता से पूर्ववर्त्ती शुक्र और वृहस्पति ने अपने नीतिग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की और आंगिरस मुनि की बन्दना की है अतः उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए ग्रन्थकर्त्ता ने अपने इस नीतिग्रन्थ में प्रथमतः सोमदेव मुनि की वन्दना की है । श्लेष से इसमें ग्रन्थकर्त्ता के नाम सोमदेव का भी संकेत है । नीतिवाक्यामृत के एक टीकाकार ने इस श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और शिव की वन्दना का अर्थ किया है जो संस्कृत टीका में शब्दों की विभिन्न व्युत्पत्ति के अनुसार संगत है । हिन्दी में वैसा अर्थ करना संगत न होगा । १. धर्मसमुद्देशः राज्यवन्दना— अथ धर्मार्थकामफलाय राज्याय नमः ॥ १ ॥ धर्म-अर्थ और काम की सिद्धि करनेवाले राज्य को नमस्कार है । विशेषार्थ—अथ शब्द मंगलात्मक और ग्रन्थारम्भ का सूचक है । शुक्राचार्य ने अपने नीतिशास्त्र के प्रारम्भ में इसी प्रकार राज्य की वन्दना की है । उन्होंने राज्य को सुन्दर वृक्ष कहा है जिसकी—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय रूप षड्गुण शाखाएँ हैं, साम, दाम, दण्ड और भेद मनोहर पुष्प हैं और धर्म, अर्थ और काम फल हैं ।