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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages
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॥ श्रीः ॥ नीतिवाक्यामृतम् —— मङ्गलाचरणम् सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभवम् । सोमदेवं मुनिं नत्वा नीतिवाक्यामृतं ब्रुवे ॥ १ ॥ कीर्त्तिमान् , कुबेर के समान आकृतिवाले, चन्द्रतुल्य कान्तिवाले तथा सोमवंश में अथवा सोम नामक व्यक्तिविशेष से समुत्पन्न सोमदेव मुनि को नमस्कार कर मैं अमृतमय नीतिवाक्यों को कहता हूँ । विशेषार्थ—उमा शब्द कीर्त्ति का वाचक है उससे संयुक्त जो हो वह सोम अतः सोमं का अर्थ कीर्त्तिमान् है । ग्रन्थकर्त्ता से पूर्ववर्त्ती शुक्र और वृहस्पति ने अपने नीतिग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की और आंगिरस मुनि की बन्दना की है अतः उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए ग्रन्थकर्त्ता ने अपने इस नीतिग्रन्थ में प्रथमतः सोमदेव मुनि की वन्दना की है । श्लेष से इसमें ग्रन्थकर्त्ता के नाम सोमदेव का भी संकेत है । नीतिवाक्यामृत के एक टीकाकार ने इस श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और शिव की वन्दना का अर्थ किया है जो संस्कृत टीका में शब्दों की विभिन्न व्युत्पत्ति के अनुसार संगत है । हिन्दी में वैसा अर्थ करना संगत न होगा । १. धर्मसमुद्देशः राज्यवन्दना— अथ धर्मार्थकामफलाय राज्याय नमः ॥ १ ॥ धर्म-अर्थ और काम की सिद्धि करनेवाले राज्य को नमस्कार है । विशेषार्थ—अथ शब्द मंगलात्मक और ग्रन्थारम्भ का सूचक है । शुक्राचार्य ने अपने नीतिशास्त्र के प्रारम्भ में इसी प्रकार राज्य की वन्दना की है । उन्होंने राज्य को सुन्दर वृक्ष कहा है जिसकी—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय रूप षड्गुण शाखाएँ हैं, साम, दाम, दण्ड और भेद मनोहर पुष्प हैं और धर्म, अर्थ और काम फल हैं ।

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२ नीतिवाक्यामृतम् नमोऽस्तु राज्यवृक्षाय षाड्गुण्याय प्रशाखिने । सामादिचारुपुष्पाय त्रिवर्गफलदायिने ॥ नीति-ग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की वन्दना बड़ी उपयुक्त और सुन्दर कल्पना है । धर्म का लक्षण — यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥ २ ॥ जिससे मानव का अभ्युदय और कल्याण हो वह धर्म है । विशेषार्थ—महर्षि कणाद के मत से अभ्युदय का अर्थ तत्त्वज्ञान और निःश्रेयस का दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति है । इस प्रकार तत्त्वज्ञान के द्वारा दुःख की अत्यन्त निवृत्ति धर्म है, महर्षि गौतम के अनुसार अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग और निःश्रेयस् अर्थात् मोक्ष जिससे प्राप्त हो वह धर्म है । मीमांसकों के चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः' इस सूत्र के अनुसार वेदों के द्वारा प्रतिपादित कर्म ही धर्म है । किन्तु वेदों के द्वारा उपदिष्ट क्या सभी कर्म अविचारणीय और आवश्यक रूप से कर्त्तव्य हैं ऐसा कहकर इस मत का खण्डन भी किया जाता है । अधर्म का लक्षण— अधर्मः पुनरेतद् विपरीतफलः ॥ ३ ॥ जिस कार्य का फल अभ्युदय और निःश्रेयस् से विपरीत हो वह अधर्म है । धर्मप्राप्ति के उपाय — आत्मवत् परत्र कुशलचिन्तनं शक्तितस्त्यागतपसी च धर्माधिगमो- पायाः ॥ ४ ॥ अपने ही समान दूसरे के कुशल और कल्याण का चिन्तन तथा शक्ति के अनुसार त्याग, तपस्या करना धर्म की प्राप्ति के साधन हैं । श्रेष्ठ आचरण— सर्वसत्वेषु हि समता सर्वाचरणानां परमाचरणम् ॥ ५ ॥ जीव-मात्र पर समता अर्थात् निर्वैरता का भाव समस्त शुभ आचरणों में श्रेष्ठ आचरण है । जीवद्रोहियों की दशा का वर्णन — न खलु भूतद्रुहां कापि क्रिया प्रसूते श्रेयांसि ॥ ६ ॥ जीवों से द्रोह करनेवाले व्यक्ति की कोई भी क्रिया कल्याण-कारिणी नहीं होती । विशेषार्थ—जीव चार प्रकार के हैं—स्वेदज, अण्डज, उद्भिज और

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धर्मसमुद्देशः ३ जरायुज—इन पर जो दयाभाव न रखकर द्रोह अथवा हिंसा का भाव रखता है उसके स्नान-दान-जप आदि समस्त शुभाचरण व्यर्थ होते हैं। अहिंसक होने का फल— परत्राजिघांसुमनसां व्रतरिक्तमपि चित्तं स्वर्गाय जायते ॥ ७ ॥ दूसरों पर अहिंसा का भाव रखनेवाले व्यक्ति का व्रत-हीन भी जीवन स्वर्गदायक होता है। असत् त्याग का लक्षण— स खलु त्यागो देशत्यागाय यस्मिन् कृते भवत्यात्मनो दौः- स्थित्यम् ॥ ८ ॥ जिस त्याग-कार्य से अपनी दुर्दशा हो जाय वह त्याग का कार्य देश-त्याग करा देता है। विशेषार्थ—इस सूत्र का स्पष्टीकरण शुक्रनीति के निम्न-श्लोक में देखिए, आगतेरधिकं त्यागं यः कुर्यात् तत्सुतादयः । दुःस्थिताः स्युः ऋणग्रस्ताः सोऽपि देशान्तरं व्रजेत् ॥ अविवेकी याचक की निन्दा— स खल्वर्थी परिपन्थी यः परस्य दौःस्थित्यं जानन्नप्यभिलष- त्यर्थम् ॥ ९ ॥ वह याचक निश्चय ही शत्रु है जो दूसरे की दरिद्रावस्था को जानते हुए भी उससे धन की याचना करता है। व्रत-ग्रहण से पूर्व विचार की आवश्यकता— तद् व्रतमाचरितव्यं यत्र न संशयतुलामारोहतः शरीरमनसी ॥१०॥ उस व्रत-नियम आदि का पालन करना चाहिए जिससे शरीर और मन को क्लेश न हो। विशेषार्थ—यही आशय 'चारायण' के निम्न श्लोक में भी अभिव्यक्त हुआ है। अशक्त्या यः शरीरस्य व्रतं नियममेव वा। करोत्यार्त्तो भवेत् पश्चात् पश्चात्तापात् फलच्युतिः ॥ वास्तविक त्याग का लक्षण— ऐहिकामुष्मिकफलार्थमर्थव्ययस्त्यागः ॥ ११ ॥ जिस अर्थ-व्यय अथवा त्याग से इहलोक, परलोक दोनों के ही फल का लाभ हो वही वास्तविक त्याग है।

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४ नीतिवाक्यममृतम् अपात्र में दान की निन्दा— भस्मनि हुतमिवापात्रेष्वर्थव्ययः ॥ १२ ॥ अपात्र अथवा कुपात्र के निमित्त अर्थ का व्यय करना राख के ढेर में आहुति देने के समान है । पात्रभेद— पात्रञ्च त्रिविधं धर्मपात्रं कार्यपात्रं कामपात्रञ्चेति ॥ १३ ॥ पात्र तीन प्रकार के हैं धर्म पात्र कार्य पात्र और कामपात्र । विशेषार्थ—जिनकी शिक्षा दीक्षा और सदाचार से हम सत्पथ पर आरूढ हों वह धर्मपात्र हैं । जिनसे सांसारिक कार्य सिद्ध हो वह कार्यपात्र हैं और अपनी गृहिणी काम पात्र है क्योंकि उसके द्वारा इहलोक-परलोक दोनों बनता है । कीर्ति कैसी हो ?— किं तया कीर्त्या या आश्रितान्न विभर्त्ति प्रतिरुणद्धि वा धर्मम् । भागीरथी-श्री-पर्वतवद् भावानामन्यदेव प्रसिद्धेः कारणं न पुनस्त्यागः । यतो न खलु गृहीतारो व्यापिनः सनातनाश्च ॥ १४ ॥ जिससे आश्रितों का भरण-पोषण न हो सके और जो धर्म के प्रतिकूल हो उस कीर्ति से क्या लाभ है । गंगा, लक्ष्मी और विन्ध्य हिमालय आदि पर्वत विशेष के समान प्रसिद्धि का कारण कुछ दूसरा ही होता है, त्याग नहीं । क्योंकि लाभान्वित होनेवाले व्यक्ति व्यापक और सनातन नहीं होते । विशेषार्थ—अर्थात् धूर्त्त खुशामदी शराबी और दुराचारिणी स्त्रियां आदि यदि हम से द्रव्य पाकर हमारी प्रशंसा करते फिरें और हमारे कुटुम्बी भूखों मरें तो हमारी वह कीर्ति व्यर्थ है । दुष्टों का उत्कर्ष करने वाली यह कीर्ति धर्म विरोधिनी भी स्पष्ट है । धन की सार्थकता के विषय में— स खलु कस्यापि माभूदर्थो यत्रासंविभागः शरणागतानाम् ॥ १५ ॥ जिस धनमें से शरणागतों को विभाग न किया जाय ऐसा धन किसी को न हो । एकान्त लोभी की निन्दा— अर्थिषु संविभागः स्वयमुपभोगश्चार्थस्य हि द्वे फले, नास्त्यौचित्य- मेकान्तलुब्धस्य ॥ १६ ॥ याचकों को दान देना और स्वयम् उपभोग करना, अर्थ के ये ही दो प्रयोजन हैं । एकान्त लोभी व्यक्ति के धन का कोई "औचित्य" नहीं है ।

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धर्मसमुद्देशः ५ , औचित्य की परिभाषा— दानप्रियवचनाभ्यामन्यस्य हि सन्तोषोत्पादनमौचित्यम् ॥ १७ ॥ दान और प्रिय वचनों से दूसरे को सन्तुष्ट करने को औचित्य कहते हैं। लोभी कौन है— स खलु लुब्धो यः सत्सु विनियोगादात्मना सह जन्मान्तरेषु नय- त्यर्थम् ॥ १८ ॥ सच्चा लोभी तो वह है जो सत्पात्र को दान देने के कारण अपनी धन- राशि को जन्मान्तर में भी अपने साथ ले जाता है। विशेषार्थ—व्यंग्यान्तर से वह सत्पात्र में अर्थ के उपयोग की प्रशंसा है। भारतीय चिन्तन के अनुसार सत्पात्र में दिया दान अक्षय होकर जन्मान्तर में मिलता है। दान न देकर मीठी बातों से याचक को रोक रखने की निन्दा— अदातुः प्रियालापोऽन्यस्य लाभस्यान्तरायः ॥ १६ ॥ याचक को दान न देने वाला व्यक्ति यदि उसे अपने प्रिय वचनों से रोक रखता है तो उस याचक को अन्य स्थान से मिल सकने वाले दान की हानि करता है। दरिद्र असहाय होता है— सदैव दुःस्थितानां को नाम बन्धुः ॥ २६ ॥ सदा दुर्दशा में पड़े हुए का सहायक कोई नहीं होता। याचक के दोष— नित्यमर्थयतां को नाम नोद्विजते ॥ २१ ॥ सदा माँगनेवालों से कौन नहीं घबड़ाता। विशेषार्थ—बहुत देर तक दूध पीते रहने वाले बछड़े को गाय भी सींग मार कर हटाती है, "अपि वत्समतिपिबन्तं विषाणैरधिक्षिपति धेनुः” ॥ तप क्या है— इन्द्रियमनसोर्नियमानुष्ठानं तपः ॥ २२ ॥ नियमों के अनुष्ठान से इन्द्रियों और मन को वश में करना ही तप है। नियम क्या है— विहिताचरणं निषिद्धपरिवर्जनं च नियमः ॥ २३ ॥ शास्त्रों में विहित आचार का परिपालन और निषिद्ध आचार का परि- त्याग ही नियम है।

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६ नीतिवाक्यामृतम् कर्त्तव्याकर्त्तव्य में शास्त्र की प्रामाणिकता— विधि-निषेधावैतिह्यायत्तौ ॥ २४ ॥ विधि और निषेध ऐतिह्य ( आगमों ) के अधीन हैं । अर्थात् कौन सा कार्य करना चाहिए कौन नहीं करना चाहिए इसका ज्ञान शास्त्रों से प्राप्त करे । विशेषार्थ—साङ्ख्य शास्त्र में प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण माने गये हैं। नैयायिक इन तीनों के साथ उपमान को भी प्रमाण मानते हैं। वेदान्ती और मीमांसक इन चारों के साथ अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को भी प्रमाण मानते हैं । पौराणिक इनके अतिरिक्त 'ऐतिह्य' को भी प्रमाण मानते हैं । जो बात परम्परा से कही सुनी जाती हो और उसका कोई निश्चित वक्ता न कहा जा सके वही ऐतिह्य है। जैसे इस पेड़ पर भूत रहता है । इस मन्दिर के देवता रात को गाँव के चारों ओर घूमते हैं यह लोकापवाद "ऐतिह्य" है । नीतिवाक्यामृत के इस ऐतिह्य का अर्थ जनश्रुति ही है । इसीलिए इसके अग्रिम सूत्र में कहा जा रहा है— किस तरह के शास्त्र प्रमाण मानने चाहिए— तत्तखलु सद्भिः श्रद्धेयम् ऐतिह्यम्, यत्र न प्रमाणबाधा पूर्वापर- विरोधो वा ॥ २५ ॥ सत्पुरुषों को उसी ऐतिह्य पर श्रद्धा करनी चाहिए जो प्रमाणों के प्रति- कूल न हो और जिसमें पूर्वापर विरोध न होता हो । चंचल मनवाले के नियमाचार की व्यर्थता— हस्तिस्नानमिव सर्वानुष्ठानम्, अनियमितेन्द्रियमनोवृत्तीनाम् ॥२६॥ जिस पुरुष की इन्द्रियां और मन के व्यापार नियमित नहीं हैं उस की समस्त सत् क्रिया हाथी के स्नान की तरह है । विशेषार्थ—हाथी नहाने के बाद पुनः अपनी सूंड से अपने ऊपर धूल डालकर गन्दा हो जाता है। इसी प्रकार चंचल मन और इन्द्रिय वाले व्यक्ति शुभानुष्ठान के साथ असदनुष्ठान कर अपना शुभ अनुष्ठान व्यर्थ कर देते हैं। ज्ञान के अनुकूल स्वयं आचरण न करने की निन्दा— दुर्भागाभरणमिव देहखेदावहमेव ज्ञानं स्वयम् अनाचरतः ॥ २६ ॥ ज्ञान प्राप्त कर स्वयम् उसके अनुकूल आचरण न करने वाले व्यक्ति का ज्ञान पति का प्रेम और आदर न प्राप्त कर सकने वाली अभागिनी स्त्री के आभूषण धारण के समान व्यर्थ देह-क्लेश-कारक ही होता है । ( प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता-कालिदास )

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धर्मसमुद्देशः ७ परोपदेश की सहजता— सुलभः खलु कथक इव परस्य धर्मोपदेशो लोकः ॥ २८ ॥ देवालयों में कथा बांचने वाले की तरह दूसरों को धर्मोपदेश करने वाले व्यक्ति सर्वत्र सुलभ होते हैं । प्रतिदिन के दान और तप की महिमा— प्रत्यहं किमपि नियमेन प्रयच्छतस्तपस्यतो वा भवन्त्यवशयं मही- यांसः परे लोकाः ॥ २६ ॥ प्रतिदिन नियम पूर्वक कुछ न कुछ दान और तपस्या करनेवाले व्यक्ति को निश्चय ही महान् परलोक प्राप्त होते हैं । प्रतिदिन का स्वल्प संचय भी विशेष फलवान् होता है— कालेन संचीयमानः परमाणुरपि जायते मेरुः ॥ ३० ॥ नित्य संचय करते रहने पर छोटी से छोटी वस्तु भी समय पाकर सुमेरु बन जाती है । धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन सङ्ग्रह करना चाहिए— धर्मश्रुतधनानां प्रतिदिनं लवोऽपि सङ्गृह्यमाणो भवति समुद्रा- दप्यधिकः ॥ ३१ ॥ धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन लेशमात्र भी सङ्ग्रह करते रहने पर समुद्र से भी अधिक हो जाता है । नित्य धर्माचरण न करने के दोष— धर्माय नित्यमनाश्रयमाणानामात्मवञ्चनं भवति ॥ ३२ ॥ . धर्म के निमित्त नित्य कुछ न करना आत्मवञ्चना है । पुण्य प्राप्ति के लिये नित्य प्रयत्न करना चाहिए— कस्य नाम एकदैव संपद्यते पुण्यराशिः ॥ ३३ ॥ एक बार ही किस को पुण्यराशि प्राप्त हो जाती है ? अर्थात् अनायास ही किसी को पुण्य-पुंज नहीं प्राप्त हो सकता; धीरे-धीरे क्रमशः पुण्य करते रहने पर ही पुण्य-पुञ्ज एकत्र होता है । अनुद्योगी के मनोरथों की निन्दा— अनाचरतो मनोरथाः स्वप्नराज्यसमाः ॥ ३४ ॥ उद्यम न करने वाले व्यक्ति के मनोरथ स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षणिक होते हैं । धर्म के लाभ जानते हुए भी अधर्माचार की निन्दा— धर्मफलमनुभवतोऽप्यधर्माऽनुष्ठानमनात्मज्ञस्य ॥ ३५ ॥ जो धर्म के फल का उपभोग करता हुआ भी अधर्म करता है वह मूर्ख है ।

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८ नीतिवाक्यामृतम् बुद्धिमान् व्यक्ति धर्माचार में स्वयं ही प्रवृत्त होता है— कःसुधी भेषजमिवात्महितं धर्मं परोपरोधादनुतिष्ठति ॥ ३६ ॥ कौन बुद्धिमान् औषध के समान आत्महितकारी धर्म को दूसरे के अनुरोध से करता है ? अर्थात् बुद्धिमान् व्यक्ति स्वयं ही धर्माचरण में प्रवृत्त होते हैं। धर्माचरण की कठिनाइयां— धर्मानुष्ठाने भवत्यप्रार्थितमपि प्रतिलोभ्यं लोकस्य ॥ ३७ ॥ धर्म का अनुष्ठान करते समय विघ्न बिना बुलाये ही उपस्थित हो जाते हैं । पापकर्म में मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति— अधर्मकर्मणि को नाम नोपाध्यायः पुरस्कारी वा ? ॥ ३८ ॥ अधर्म के काम में कौन नहीं स्वयम् उपाध्याय और अग्रसर होता । अधर्म करने के लिये किसी उपदेशक और मुखिया की आवश्यकता नहीं होती मनुष्य स्वयम् ही उस ओर प्रवृत्त होता है । चतुर व्यक्ति का कर्त्तव्य— कण्ठगतैरपि प्राणैर्नाशुभं कर्म समाचरणीयं कुशलमतिभिः ॥ ३६ ॥ प्राण कण्ठ को भी आ जाय तब भी बुद्धिमान् पुरुष को निन्दित कर्म नहीं करना चाहिए । धूर्तों का धनिकों को पाप कर्म में प्रवृत्त करना— व्यसनतर्पणाय धूर्त्तैर्दुरीहितवृत्तयः क्रियन्ते श्रीमन्तः ॥ ४० ॥ अपने दुर्व्यसनों की पूर्ति के लिये धूर्त्त लोग धनिकों को पापमार्ग पर प्रवृत्त करते हैं । दुष्ट की संगति त्याज्य है— खलसंगमेन किं नाम न भवत्यनिष्टम् ? ॥ ४१ ॥ दुष्ट की संगति से कौन सा अनिष्ट नहीं होता है । दुर्जन निन्दा— अग्निरिव स्वाश्रयमेव दहन्ति दुर्जनाः ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार अग्नि अपने आधार काष्ठ को जलाकर नष्ट कर देती है उसी प्रकार दुष्ट पुरुष भी अपने आश्रयदाता का नाश कर डालते हैं । क्षणिक सुख के लोभ की निन्दा— वनगज इव तदात्वसुखलुब्धः को नाम न भवत्यास्पद्माप- दाम् ? ॥ ४३ ॥ जंगली हाथी के समान तात्कालिक सुख के लोभ में पड़कर कौन व्यक्ति आपत्तिग्रस्त नहीं होता ?

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धर्मसमुद्देशः ६ विशेषार्थ—हाथी पकड़ने वाले व्यक्ति एक शिक्षित हथिनी को जंगल में छोड़ देते हैं वनैला हाथी उसके स्पर्श सुखका अनुभव करता हुआ बन्धन में पड़ जाता है इसी प्रकार पराई स्त्री के स्पर्शादि के क्षणिक सुख के लोभ में पड़ा व्यक्ति भी दुर्गति को प्राप्त होता है । धर्माचरण से विमुख होने के दोष— धर्मातिक्रमाद् धनं परेऽनुभवन्ति स्वयं तु परं पापस्य भाजनं सिंह इव सिन्धुरवधात् ॥ ४४ ॥ सिंह हाथी का वध करके छोड़ देता है और उसे सियार आदि खाते हैं इसी प्रकार धर्म का उल्लङ्घन कर मनुष्य चोरी आदि दुष्कर्मों से धन प्राप्त करता है और उस धन का उपभोग उसके पुत्र पौत्रादि करते हैं परन्तु पाप का भागी वह मनुष्य होता है । धर्महीन व्यक्ति का भविष्य— बीजभोजिनः कुटुम्बिन इव नास्त्यधार्मिकस्यायत्यां किमपि शुभम् ॥ ४५ ॥ बीज के लिये सुरक्षित अन्न को खाकर जिस प्रकार कुटुम्ब-परिवार वाला व्यक्ति परिणाम में दुःख पाता है उसी प्रकार धर्म-हीन व्यक्ति को भी परिणाम में कोई सुख नहीं प्राप्त होता । अर्थ और काम से रहित केवल धर्मोपासना का अनौचित्य— यः कामार्थावुपहत्य धर्ममेवोपास्ते स पक्व-क्षेत्रं परित्यज्यारण्यं कृषति ॥ ४६ ॥ जो पुरुष काम और अर्थ की उपेक्षा कर केवल धर्माचरण में तत्पर होता है वह मानों अपने पके हुए खेत को छोड़कर जंगल को जोतने जाता है । विशेषार्थ—सुखार्थी को काम और अर्थ के साथ धर्म का सेवन करना चाहिए, इस समान आशय का रैभ्य का श्लोक है, कामार्थसहितो धर्मो न क्लेशाय प्रजायते । तस्मात्ताभ्यां समेतस्तु कार्य एव सुखार्थिभिः ॥ सच्चा सुबुद्धि कौन है— स खलु सुधीर्योऽमुत्र सुखाविरोधेन सुखमनुभवति ॥ ४७ ॥ विद्वान् वही है जो परलोक में प्राप्त होने वाले सुख की हानि न हो इस बात का ध्यान रखते हुए इस लोक के सुख का अनुभव करता है । अन्यायपूर्वक सुख भोग करने का फल— इदमीह परमाश्चर्यं यदन्यायसुखलवादिहामुत्र चानवधिदुःखानु- बन्धः ॥ ४८ ॥

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१० नीतिवाक्यामृतम् यहां यह अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि चोरी आदि अन्याय-कर्म के द्वारा उपार्जित धनादि से सुख का लेश मात्र भी उपभोग इस लोक और परलोक में भी निरवधि दुःखदायक होता है । यहां राजदण्ड वहां धर्मराज का । धर्मी और अधर्मी की पहचान— सुखदुःखादिभिः प्राणिनामुत्कर्षापकर्षौ धर्माधर्मयोर्लिङ्गम् ॥ ४६ ॥ इस जन्म में जीवों के सुख और दुःख का उत्कर्ष तथा अपकर्ष देखकर उसके द्वारा पूर्वजन्म में किये गये धर्म-अधर्म की पहचान होती है । अदृष्ट ( दैव ) की व्यापक प्रभुता— किमपि हि तद्वस्तु नास्ति यत्र नैश्वर्यमदृष्टाधिष्ठातुः ॥ ५६ ॥ संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जहाँ अदृष्ट की प्रभुता न हो । विशेषार्थ—अदृष्ट—मनुष्य के नित्य के भोजन-पान से उसके शरीर में अलक्ष्य शक्ति संचित होती है उसी के अनुसार वह सांसारिक कार्य करता है विद्युद् गृह में जल प्रपात आदि से भी इसी प्रकार अलक्ष्य विद्युत् शक्ति उत्पन्न होती है जिससे महान् यन्त्र आदि परिचालित होते हैं और प्रकाश मिलता है । इसी प्रकार मनुष्य के द्वारा नित्य प्रति किये जाने वाले शुभाशुभ कर्म अथवा धर्माधर्म से एक अनिर्वचनीय “अदृष्ट” उत्पन्न होता है जो संचित होता जाता है और उसके अनुसार ही मनुष्य को जन्म-जन्मान्तर में सुख तथा दुःख मिलते रहते हैं । इति धर्मसमुद्देशः २. अर्थसमुद्देशः अर्थ का लक्षण— यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः ॥ १ ॥ जिससे समस्त कार्य अथवा योजनाएं सिद्ध हों वह अर्थ ( धन ) है । धनी कौन होता है— सोऽर्थस्य भाजनं योऽर्थानुबन्धेनार्थमनुभवति ॥ २ ॥ धनी वह होता है जो अर्थानुबन्ध से अर्थ का उपभोग करता है । अर्थानुबन्ध का लक्षण— अलब्धलाभो, लब्धपरिरक्षणं रक्षितपरिवर्द्धनं चार्थानुबन्धः ॥ ३ ॥ अप्राप्त धन को प्राप्त करना, प्राप्त धन की रक्षा करना और सुरक्षित धन की वृद्धि करना अर्थानुबन्ध है ।

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अर्थसमुद्देशः ११ अर्थनाश का कारण— तीर्थमर्थेनासंभावयन् मधुच्छत्रमिव सर्वात्मना विनश्यति ॥ ४ ॥ धन के द्वारा जो तीर्थ का सत्कार नहीं करता उसका मधुमक्खी के छत्ते के समान सर्वनाश हो जाता है । विशेषार्थ—तीर्थ का अर्थ अग्रिम सूत्र में है । मधुमक्खी के छाते में जब मधु अधिक इकट्ठा हो जाता है तो मक्खियाँ उसे स्वयं पी जाती हैं यदि उन्हें न पीने दिया जाय तो भी छत्ते का मधु अपने आप नष्ट हो जाता है या मोम बन जाता है । इसी तरह दान-मान द्वारा तीर्थ की पूजा न की गई तो धनी का धन भी नष्ट हो जाता है । तीर्थ का लक्षण— धर्मसमवायिनः कार्यसमवायिनश्च पुरुषास्तीर्थम् ॥ ५ ॥ धार्मिक कृत्यों में सहयोग देने वाले और सब कामों में हाथ बटाने वाले पुरुषों को तीर्थ कहते हैं । किन का धन नष्ट हो जाता है— तादात्विक-मूलहर-कदर्येषु नासुलभः प्रत्यवायः ॥ ६ ॥ तादात्विक, मूलहर और कदर्य धनिकों का धन सदा नष्ट हो जाता है । तादात्विक का लक्षण— यः किमप्यसंन्चिन्त्योत्पन्नमर्थं व्ययति स तादात्विकः ॥ ७ ॥ उपार्जित धन को जो बिना विवेक के खर्च करता है उसे 'तादात्विक' कहते हैं । मूलहर का लक्षण— यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः ॥ ८ ॥ पिता और पितामह से प्राप्त सम्पत्ति को जो अन्यायपूर्वक अर्थात् जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति आदि में उड़ाता है वह 'मूलहर' कहा जाता है । कदर्य का लक्षण— यो भृत्यात्मपीडाभ्यामर्थं संचिनोति स कदर्यः ॥ ९ ॥ सेवकों को और स्वयम् को भी कष्ट में रख कर जो धन का संग्रह करता है उसे 'कदर्य' कहते हैं । तादात्विक और मूलहर का भविष्य— तादात्विकमूलहरयोरायत्यां नास्ति कल्याणम् ॥ १० ॥ तादात्विक और मूलहर का परिणामावस्था में कल्याण नहीं होता । कदर्य के धनसंग्रह का परिणाम— कदर्यस्यार्थसंग्रहो राजदायादतस्कराणामन्यतमस्य निधिः ॥ ११ ॥

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १२ नीतिवाक्यामृतम् कदर्य का अर्थसंग्रह राजा, दायाद और चोरों की निधि है। अर्थात् ऐसा धन चोर, पट्टीदार अथवा राजा के ही काम आता है। इत्यर्थसमुद्देशः। ३. कामसमुद्देशः काम का स्वरूप— आभिमानिकरसानुविद्धा यतः सर्वेन्द्रियप्रीतिः स कामः ॥ १ ॥ तन्मयता के साथ जिससे समस्त इन्द्रियों को परितृप्ति और प्रसन्नता हो उसे 'काम' कहते हैं। विशेषार्थ—काम शब्द का अर्थ इच्छा और अभिलाष है। स्त्री का पुरुष के प्रति, पुरुष का स्त्री के प्रति मिलन का अभिलाष ही धर्म और अर्थ के प्रसङ्ग में काम शब्द का अर्थ है। दूसरे शब्दों में यही अभिलाष अनुराग है। स्त्री पुरुष के अनुराग में एक अनिर्वचनीय स्वाभाविक तल्लीनता होती है जिसका परिचय यहां 'आभिमानिक' शब्द के द्वारा कराया गया है।

  • काम-सेवा का प्रकार— धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत ततः सुखी स्यात् ॥ २ ॥ धर्म और अर्थ का ध्यान रखते हुए काम का सेवन करने से मनुष्य सुखी रहता है। "त्रिवर्ग" पालन का क्रम— समं वा त्रिवर्गं सेवेत ॥ ३ ॥ त्रिवर्ग का सेवन समरूप से करना चाहिए। विशेषार्थ—धर्म अर्थ और काम का सम्मिलित नाम त्रिवर्ग है। जितना समय धर्मचिन्तन में लगावे उतना ही अर्थ चिन्तन में तथा काम-चिन्तन में भी लगावे। अर्थ धर्म और काम में से किसी एक के प्रति अधिक अनुरक्ति का दोष— एकोह्यत्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति ॥ ४ ॥ धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में से एक का अधिक सेवन करने से एक की तो वृद्धि होती है किन्तु दो को बाधा पहुँचती है। आत्म-सुख की अवहेलना कर धनोपार्जन करना अनुचित है— परार्थं भारवाहिन इवात्मसुखं निरुन्धानस्य धनोपार्जनम् ॥ ५ ॥ अपना सुखभोग त्याग कर धन का उपार्जन करना दूसरे के लिये बोझा ढोने के समान है। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
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कामसमुद्देशः १३ ऐश्वर्य की सफलता— इन्द्रियमनः प्रसादनफला हि विभूतयः ॥ ६ ॥ ऐश्वर्यं का फल इन्द्रियों और मन की प्रसन्नता है। जिस ऐश्वर्यं से अपनी इंद्रियां और मन प्रसन्न न रह सके वह ऐश्वर्यं व्यर्थं है। अजितेन्द्रिय होने का दोष— नाजितेन्द्रियाणां कापि कार्यसिद्धिरस्ति ॥ ७ ॥ जिन की इन्द्रियां वश में नहीं हैं, उनको किसी भी कार्यं में सफलता नहीं मिलती। इन्द्रिय जय का स्वरूप— इष्टेऽर्थेऽनासक्तिर्विरुद्धे चाप्रवृत्तिरिन्द्रियजयः ॥ ८ ॥ प्रिय वस्तु में अधिक आसक्त न होना और प्रतिकूल में प्रवृत्त न होने का नाम इन्द्रिय जय है। विशेषार्थ—प्रतिकूल कार्य में मनुष्य स्वभावतः नहीं प्रवृत्त होता उसके विषय में यहां विशेष रूप से लिखने का तात्पर्यं "कामसमुद्देश" प्रकरण की दृष्टि से यह है कि प्रिय प्रेयसी पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल पर- दारा के सेवन में प्रवृत्त ही न होना वास्तविक इन्द्रिय विजय है। अथवा प्रिय पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल से घबड़ाना नहीं इन्द्रियजय का लक्षण है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से "इन्द्रियजय"— अर्थशास्त्राध्ययनं वा ॥ ६ ॥ अथवा अर्थशास्त्र का अध्ययन भी इन्द्रिय जय का कारण है। नीतिशास्त्राण्यधीते यस्तस्य दुष्टानि खान्येपि । वशगानि शनैर्यान्ति कशाघातैर्हया यथा ॥ काम के दोष— योऽनङ्गेनापि जीयते स कथं [पुष्टाङ्गानरातीन् जयेत् ॥ १० ॥ कामदेव को महादेव जी ने भस्म कर दिया था इस लिये उसकी 'अनङ्ग' संज्ञा है। यहां शाब्दिक चमत्कार पूर्वक कहा गया है कि जो बिना अङ्गवाले से भी जीता जा सकता है अर्थात् काम के वशीभूत हो जाता है वह पुष्ट अङ्ग वाले शत्रुओं को कैसे जीत सकता है। कामी पुरुष असाध्य रोगी है— कामासक्तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ११ ॥ अत्यन्त कामी पुरुष को विनाश से बचाने के लिये कोई चिकित्सा ( उपाय ) नहीं है।

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१४ नीतिवाक्यामृतम् स्त्रियो पर अत्यासक्ति के दोष— न तस्य धनं धर्मः शरीरं वा यस्यास्ति स्त्रीष्वत्यासक्तिः ॥ १२ ॥ स्त्रियों पर अत्यन्त यासक्त पुरुष के धन धर्म और शरीर का क्षय हो जाता है । परस्त्रीगमन के दोष-- विरुद्धकामवृत्तिः समृद्धोऽपि न चिरं नन्दति ॥ १३ ॥ विरुद्ध कामवृत्ति अर्थात् परस्त्री में रत पुरुष समृद्धिशाली होते हुये भी चिरकाल तक समृद्धि का उपभोग नहीं कर पाता । धर्म अर्थ और काम की क्रमिक श्रेष्ठता— धर्मार्थकामानां युगपत्समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ १४ ॥ धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का कार्य एक साथ प्राप्त होने पर क्रमशः पूर्व-पूर्वं गुरुतर है काम की अपेक्षा अर्थ और अर्थ की अपेक्षा धर्म का सेवन श्रेष्ठ है । समयानुसार अर्थसेवन को प्रधानता-- कालसहत्वे पुनरर्थ एव ॥ १५ ॥ ( धर्मकामयोरर्थमूलत्वात् ) यदि धर्म, अर्थ और काम का कर्त्तव्य एक साथ उपस्थित हो और धर्म तथा काम के कर्त्तव्य का पालन समयान्तर में भी किया जा सकता हो तो अर्थ-कर्त्तव्य को ही प्रधानता देनी चाहिए क्योंकि अर्थ समुद्देश के प्रारम्भ में ही कहा गया है—यतः सर्वं प्रयोजन सिद्धिः सोऽर्थः । द्रव्य होने पर ही धर्म और काम का सुचारु-संपादन हो सकता है । इति कामसमुद्देशः ४. अरिषड्वर्गसमुद्देशः राजाओं के छः आभ्यन्तर शत्रु— अयुक्तितः प्रणीताः काम-क्रोध-लोभ-मद-मान-हर्षाः क्षितीशानामन्त- रङ्गोऽरिषड्वर्गः ॥ १ ॥ युक्ति-पूर्वक प्रयोग न करने पर राजाओं के लिये काम, क्रोध, लोभ, मद मान और हर्ष ये छह भीतरी शत्रुसमूह हैं । कामासक्ति का दोष— परपरिगृहीतासु, अनूढासु च स्त्रीषु दुरभिसन्धिः कामः ॥ २ ॥ दूसरे के द्वारा ग्रहण की गई स्त्री अथवा कुमारी कन्या पर आसक्ति ही काम है ।

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विद्यावृद्धसमुद्देशः १५ विना विचार के क्रोध का फल— अविचार्य परस्यात्मनो वाऽपायहेतुः क्रोधः ॥ ३ ॥ शत्रु की और अपनी शक्ति का विचार न करके क्रोध कर बैठना राजा के नाश का कारण बन जाता है । लोभ का स्वरूप— दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः ॥ ४ ॥ जो दान के योग्य हैं उनको दान न देना और दूसरे के धन को ले लेना लोभ है । मान का स्वरूप— दुरभिनिवेशामोक्षो यथोक्ताग्रहणं वा मानः ॥ ५ ॥ दुराग्रह न छोड़ना और शास्त्रोपदेश तथा शिष्टोपदेश को न स्वीकार करना मान है । मद का स्वरूप— कुलबलैश्वर्यरूपविद्यादिभिरात्माहङ्कारकरणं परप्रकर्षनिबन्धनं वा मदः ॥ ६ ॥ कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप और विद्या आदि का अपने में अहङ्कार रखना और दूसरे के उत्कर्ष और अभ्युदय का खण्डन करना मद है । हर्ष का स्वरूप— निर्निमित्तमन्यस्य दुःखोत्पादनेन स्वस्यार्थसंचयेन वा मनः प्रति- रञ्जनो हर्षः ॥ ७ ॥ बिना कारण ही दूसरों को दुःख देना और अर्थसंग्रह से पुलकित होना हर्ष है । इत्यरिषड्वर्गसमुद्देशः ५. विद्यावृद्धसमुद्देशः राजा का लक्षण— योऽनुकूलप्रतिकूलयोरिन्द्रयमस्थानं स राजा ॥ १ ॥ जो अपने अनुकूल आचरण करने वालों के प्रति इन्द्र के समान सुखदायक हो सके और प्रतिकूल आचरण करने वालों के प्रति यमराज के समान कठोर दण्ड दे सके वह राजा है । राजा का धर्म— राज्ञो हि दुष्टनिग्रहः शिष्टपरिपालनं च धर्मः ॥ २ ॥ दुष्टों का दमन और शिष्ट पुरुषों की रक्षा राजा का कर्त्तव्य है ।

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१६ नीतिवाक्यामृतम् राजा के अयोग्य कार्य— न पुनः शिरोमुण्डनं जटाधारणादिकं वा ॥ ३ ॥ शिर मुंड़ाना अथवा जटा आदि धारण करना राजा का काम नहीं है। राज्य का स्वरूप— राज्ञः पृथ्वीपालनोचितं कर्म राज्यम् ॥ ४ ॥ पृथ्वी पर रहने वालों का पालन-पोषण सम्बन्धी कार्य करते रहना ही राजा का राज्य है। पृथ्वी का सच्चा स्वरूप— वर्णाश्रमवती धान्य-हिरण्य-पशु-कुप्य-वृष्टिप्रदानफला च पृथ्वी ॥५॥ जिस पर चारों वर्ण और चारों आश्रमों के लोग रहते हों अनेक प्रकार के अन्न जिस पर उत्पन्न हों, और सोना-चांदी, तरह-तरह के पशु पक्षी और तांबा आदि अन्य धातुओं की प्रचुर मात्रा में जहाँ प्राप्ति हो वह पृथ्वी है। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राश्च वर्णाः ॥ ६ ॥ "आश्रम" के भेद— ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थी यतिर इत्याश्रमाः ॥ ७ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास ये चार आश्रम हैं। "उपकुर्वाणक" ब्रह्मचारी का स्वरूप— स उपकुर्वाणको ब्रह्मचारी यो वेदमधीत्य स्नायात् ॥ ८ ॥ जो वेदाध्ययन करने के अनन्तर विवाह करे उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी कहते हैं। ( स्नान की शास्त्रीय परिभाषा ) स्नान विशेष का लक्षण— स्नानं विवाहदीक्षाभिषेकः ॥ ९ ॥ विवाह संस्कार की दीक्षा के समय विशेष प्रकार के मन्त्रों से किया गया अभिषेक-जल-प्रोक्षण स्नान है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी का स्वरूप— स नैष्ठिको ब्रह्मचारी यस्य प्राणान्तिकमदारकर्म ॥ १० ॥ जो मृत्युपर्यन्त विवाह न करे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी है। पुत्र की परिभाषा— य उत्पन्नः पुनीते वंशं स पुत्रः ॥ ११ ॥ उत्पन्न होकर जो अपने सदाचार आदि से कुल को पवित्र करे वह पुत्र है।

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विद्यावृद्धसमुद्देशः १७ ऋतुप्रद ब्रह्मचारी का लक्षण— कृतोद्वाहः कृ (ऋ) तु प्रदाता ऋतुप्रदः ॥ १२ ॥ विवाह करके ऋतुकाल में जो स्त्री गमन करता है उसकी ऋतुप्रद (कृतप्रद) संज्ञा है। पुत्रोत्पत्ति के अभाव में ऋणग्रस्त की दशा का होना— अपुत्रो ब्रह्मचारी पितॄणामृणभाजनम् ॥ १३ ॥ जो ब्रह्मचारी पुत्रोत्पादन नहीं करता वह पितरों का ऋणी बना रहता है। अनध्ययनो ब्रह्मणः ॥ १४ ॥ ब्रह्मचारी होकर वेदाध्ययन न करे तो वह ब्रह्मा के प्रति ऋणी होता है। अयजनो देवानाम् ॥ १५ ॥ जो ब्रह्मचारी यज्ञ नहीं करता वह देवताओं का ऋणी होता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये आत्मा ही पुत्र है— आत्मा वै पुत्रो नैष्ठिकस्य ॥ १६ ॥ मृत्यु पर्यन्त विवाह न करने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये आत्मा ही पुत्र है। विशेषार्थ—आत्मचिन्तन करने के कारण वह पुत्र न उत्पन्न करने आदि के उपर्युक्त दोषों से मुक्त हो जाता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी की उत्तम पवित्रता— अयमात्मनात्मानमात्मनि संदधानः परां पूततामापद्यते ॥ १७ ॥ नैष्ठिक ब्रह्मचारी का यह व्यापक ब्रह्ममय आत्मा, आत्मशक्ति के द्वारा अपने आत्मा में आत्मचिन्तन करता हुआ अत्यन्त पवित्र हो जाता है। गृहस्थ का लक्षण और उसके नित्य नैमित्तिक धर्म— नित्यनैमित्तिकानुष्ठानस्थो गृहस्थः ॥ १८ ॥ जो नित्य और नैमित्तिक अनुष्ठान करता हो वह गृहस्थ है। ब्रह्मदेवपितृतितिथिभूतयज्ञा हि नित्यमनुष्ठानम् ॥ १९ ॥ यथाशक्ति परब्रह्म की आराधना, इष्ट देव की पूजा, पितरों को तर्पण, अतिथि का भोजन आदि से सत्कार और वैश्वदेवों को बलि देना इनको नित्य अनुष्ठान कहते हैं । दर्शपौर्णमास्याद्याश्रयं नैमित्तिकम् ॥ २० ॥ अमावास्या और पूर्णिमा आदि विशेष तिथियों पर किया जाने वाला श्राद्ध आदि धार्मिक कृत्य नैमित्तिक कर्म है । वैवाहिक-शालीनो-यायावरोऽघोरो गृहस्थाः ॥ २१ ॥ वैवाहिक, शालीन, यायावर और अघोर ये चार प्रकार के गृहस्थ हैं । २ नी०

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१८ नीतिवाक्यामृतम् विशेषार्थ—प्राचीनकाल में अग्नि की ही प्रधान उपासना थी। यहां अग्नि के ही प्राधान्य-अप्राधान्य से गृहस्थ के चार भेद किये गये हैं। जिसके जीवन में विवाह के अवसर की होमाग्नि ही अभिवन्द्य हुई हो वह वैवाहिक गृहस्थ है। शालीन वह है जिसने अग्निहोत्र व्रत लिया हो, ऐसा गृहस्थ जिसने अग्नि की उपासना के साथ शूद्र का धन न लेने का व्रत लिया हो वह यायावर और जो दक्षिणादान के साथ अग्निष्टोम आदि यज्ञ में तत्पर रहता हो वह अघोर संज्ञक गृहस्थ है। वानप्रस्थ का लक्षण — यः खलु यथाविधि जानपदमाहारं संसारव्यवहारं च परित्यज्य सकलत्रोऽकलत्रो वा वने प्रतिष्ठते स वानप्रस्थः ॥ २२ ॥ जो गृहस्थ लौकिक आहार-विहार और सांसारिक व्यवहार का परित्याग कर स्त्री के साथ अथवा बिना स्त्री के विधिपूर्वक वन चला जाता है वह वान- प्रस्थ है। यति का लक्षण— यो देहमात्रारामः सम्यग्विद्यानौलाभेन तृष्णासरित्तरणाय योगाय यतते स यतिः ॥ २३ ॥ स्वदेह मात्र से आनन्दित रहने वाला जो व्यक्ति ज्ञानरूपी नौका को प्राप्त कर तृष्णा-रूपी नदी को पार करने को योग मानकर उस योग के लिये यत्न करता है वह यति है। राज्य के मूल कारण और उनकी परिभाषा— राज्यस्य मूलं क्रमो विक्रमश्च ॥ २४ ॥ वंश-परम्परा से राज्य प्राप्ति और शौर्य से उसका संरक्षण यह दो क्रम और विक्रम राज्य के मूल हैं। आचारसम्पत्तिः क्रमसम्पत्तिं करोति ॥ २५ ॥ वंश परम्परा से प्राप्त राज्य की वृद्धि कुलाचार पालन से होती है। अनुत्सेकः खलु विक्रमस्यालङ्कारः ॥ २६ ॥ पराक्रम की शोभा गर्व न करने में है। राज्य की सुरक्षा का उपाय— क्रम-विक्रमयोरन्यतरपरिग्रहेण राज्यस्य दुष्करः परिणामः ॥ २७ ॥ क्रम और विक्रम इन दोनों में से केवल एक को स्वीकार करने से राज्य के लिये अच्छा परिणाम नहीं होता। विशेषार्थ—केवल आचार पालन से राज्य में दुष्टों की वृद्धि होगी और

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विद्यावृद्धसमुद्देशः १६ अत्यधिक पराक्रम से लोग उद्विग्न हो जायेंगे अतः क्रम-विक्रम दोनों के ही आश्रय से राज्य सुरक्षित रह सकता है । बुद्धिमान् राजा का लक्षण— क्रम-विक्रमयोरधिष्ठानं बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्वा ॥ २८ ॥ बुद्धिमान् राजा क्रम-विक्रम दोनों का आश्रय लेता है । अथवा वह अत्यन्त दृढ़ संकल्प या निश्चय वाला होता है । राजा के लिये विद्या और विनय की आवश्यकता— यो विद्या विनीतमतिः स बुद्धिमान् ॥ २९ ॥ शास्त्र ज्ञान के कारण विनीत बुद्धि वाला बुद्धिमान् है । केवल पुरुषार्थ की निन्दा— सिंहस्येव केवलं पौरुषावलम्बिनो न चिरं कुशलम् ॥ ३० ॥ सिंह के समान केवल पराक्रम करनेवाले राजा का स्थायी-कल्याण नहीं होता । बुद्धिबल होने पर भी शास्त्रज्ञान की आवश्यकता— अशस्त्रः शूर इवाशास्त्रः प्रज्ञावानपि भवति विद्विषां वशः ॥ ३१ ॥ बिना शस्त्र के शूर के समान बिना शास्त्रज्ञान के बुद्धिमान् भी राजा शत्रु के वश हो जाता है । शास्त्र तीसरे नेत्र हैं— अलोचनगोचरे ह्यर्थे शास्त्रं तृतीयं लोचनं पुरुषाणाम् ॥ ३२ ॥ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आंखों से जिस का ज्ञान हो सके उसके ज्ञान के लिये शास्त्र तीसरे नेत्र के समान हैं । शास्त्र न पढ़ने के दोष— अनधीतशास्त्रश्चक्षुष्मानपि पुमानन्ध एव ॥ ३३ ॥ शास्त्र न पढ़ा हुआ पुरुष आंख वाला होते हुए भी अन्धा है । मूर्ख पुरुष की निन्दा— न ह्यज्ञानादपरः पशुरस्ति ॥ ३४ ॥ मूर्ख पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कोई पशु नहीं है । वरमराजकं भुवनं न तु मूर्खो राजा ॥ ३५ ॥ बिना राजा का राज्य होना अच्छा है, किन्तु मूर्ख राजा का होना अच्छा नहीं है । असंस्कारं रत्नमिव सुजातमपि राजपुत्रं न नायकपदायामनन्ति साधवः ॥ ३६ ॥ खान अथवा समुद्र से उत्पन्न रत्न को जिस प्रकार बिना खरादे हुए

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२० नीतिवाक्यामृतम् आभूषणों में नहीं प्रतिष्ठित किया जाता उसी प्रकार सुन्दर वंश में भी समु- त्पन्न राजकुमार को सत्पुरुष लोग शास्त्रज्ञान से संस्कृत हुए बिना प्रतिष्ठित नहीं करना चाहते । दुविनीत रोग के दोष— न दुर्विनीताद् राज्ञः प्रजानां विनाशादपरोऽस्त्युत्पातः ॥ ३७ ॥ दुर्विनीत राजा से प्रजा को विनाश से अधिक दूसरे किसी उत्पात का भय नहीं होता । दुष्ट राजा से प्रजा का क्षय अवश्यम्भावी है । दुर्विनीत का लक्षण— यो युक्तायुक्तयोरविवेकी विपर्य्यस्तमतिर्वा स दुर्विनीतः ॥ ३८ ॥ जो राजा योग्य-अयोग्य का निर्णय न कर सके अथवा जिसकी बुद्धि विप- रीत हो, बुरी बात को ही अच्छा समझे, वह दुर्विनीत है । 'द्रव्य' और 'अद्रव्य' प्रकृति के राजा— यत्र सद्गिराधीयमाना गुणाः संक्रामन्ति तद् द्रव्यम् ॥ ३९ ॥ सत् पुरुषों के द्वारा दिया उपदेश जिस व्यक्ति में स्थिर रह सके वह द्रव्य- प्रकृति का पुरुष है । द्रव्यं हि क्रियां [विनयति नाद्रव्यम् ॥ ४० ॥ जो द्रव्य प्रकृति का है वही राज्य भोग कर सकता है अद्रव्य प्रकृति का नहीं । यतो द्रव्याद्रव्यप्रकृतिरप्यस्ति कश्चित् पुरुषः संकीर्णगजवत् ॥ ४१ ॥ संकीर्ण जाति का गज जिस प्रकार गजराज नहीं हो सकता उसी प्रकार द्रव्य प्रकृति के पुरुषों में भी द्रव्याद्रव्य की सङ्कर प्रकृति का पुरुष राजपद के योग्य नहीं होता । बुद्धि के ८ गुण : उन गुणों का निरूपण— शुश्रूषा-श्रवण-ग्रहण-धारणा-विज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशा बुद्धि- गुणाः ॥ ४२ ॥ बुद्धि के आठ गुण हैं, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारणा, विज्ञान, ऊह, अपोह और तत्त्वाभिनिवेश । ( इनका स्पष्टीकरण अग्रिम सूत्रों में ग्रन्थकार ने स्वयं किया है ) श्रोतुमिच्छा शुश्रूषा ॥ ४३ ॥ शास्त्रश्रवण की इच्छा ही शुश्रूषा है । श्रवणमाकर्णनम् ॥ ४४ ॥ शास्त्रीय प्रसङ्गों का सुनना श्रवण है ।