भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 220 में से

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धर्मसमुद्देशः ५ , औचित्य की परिभाषा— दानप्रियवचनाभ्यामन्यस्य हि सन्तोषोत्पादनमौचित्यम् ॥ १७ ॥ दान और प्रिय वचनों से दूसरे को सन्तुष्ट करने को औचित्य कहते हैं। लोभी कौन है— स खलु लुब्धो यः सत्सु विनियोगादात्मना सह जन्मान्तरेषु नय- त्यर्थम् ॥ १८ ॥ सच्चा लोभी तो वह है जो सत्पात्र को दान देने के कारण अपनी धन- राशि को जन्मान्तर में भी अपने साथ ले जाता है। विशेषार्थ—व्यंग्यान्तर से वह सत्पात्र में अर्थ के उपयोग की प्रशंसा है। भारतीय चिन्तन के अनुसार सत्पात्र में दिया दान अक्षय होकर जन्मान्तर में मिलता है। दान न देकर मीठी बातों से याचक को रोक रखने की निन्दा— अदातुः प्रियालापोऽन्यस्य लाभस्यान्तरायः ॥ १६ ॥ याचक को दान न देने वाला व्यक्ति यदि उसे अपने प्रिय वचनों से रोक रखता है तो उस याचक को अन्य स्थान से मिल सकने वाले दान की हानि करता है। दरिद्र असहाय होता है— सदैव दुःस्थितानां को नाम बन्धुः ॥ २६ ॥ सदा दुर्दशा में पड़े हुए का सहायक कोई नहीं होता। याचक के दोष— नित्यमर्थयतां को नाम नोद्विजते ॥ २१ ॥ सदा माँगनेवालों से कौन नहीं घबड़ाता। विशेषार्थ—बहुत देर तक दूध पीते रहने वाले बछड़े को गाय भी सींग मार कर हटाती है, "अपि वत्समतिपिबन्तं विषाणैरधिक्षिपति धेनुः” ॥ तप क्या है— इन्द्रियमनसोर्नियमानुष्ठानं तपः ॥ २२ ॥ नियमों के अनुष्ठान से इन्द्रियों और मन को वश में करना ही तप है। नियम क्या है— विहिताचरणं निषिद्धपरिवर्जनं च नियमः ॥ २३ ॥ शास्त्रों में विहित आचार का परिपालन और निषिद्ध आचार का परि- त्याग ही नियम है।

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