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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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२० नीतिवाक्यामृतम् आभूषणों में नहीं प्रतिष्ठित किया जाता उसी प्रकार सुन्दर वंश में भी समु- त्पन्न राजकुमार को सत्पुरुष लोग शास्त्रज्ञान से संस्कृत हुए बिना प्रतिष्ठित नहीं करना चाहते । दुविनीत रोग के दोष— न दुर्विनीताद् राज्ञः प्रजानां विनाशादपरोऽस्त्युत्पातः ॥ ३७ ॥ दुर्विनीत राजा से प्रजा को विनाश से अधिक दूसरे किसी उत्पात का भय नहीं होता । दुष्ट राजा से प्रजा का क्षय अवश्यम्भावी है । दुर्विनीत का लक्षण— यो युक्तायुक्तयोरविवेकी विपर्य्यस्तमतिर्वा स दुर्विनीतः ॥ ३८ ॥ जो राजा योग्य-अयोग्य का निर्णय न कर सके अथवा जिसकी बुद्धि विप- रीत हो, बुरी बात को ही अच्छा समझे, वह दुर्विनीत है । 'द्रव्य' और 'अद्रव्य' प्रकृति के राजा— यत्र सद्गिराधीयमाना गुणाः संक्रामन्ति तद् द्रव्यम् ॥ ३९ ॥ सत् पुरुषों के द्वारा दिया उपदेश जिस व्यक्ति में स्थिर रह सके वह द्रव्य- प्रकृति का पुरुष है । द्रव्यं हि क्रियां [विनयति नाद्रव्यम् ॥ ४० ॥ जो द्रव्य प्रकृति का है वही राज्य भोग कर सकता है अद्रव्य प्रकृति का नहीं । यतो द्रव्याद्रव्यप्रकृतिरप्यस्ति कश्चित् पुरुषः संकीर्णगजवत् ॥ ४१ ॥ संकीर्ण जाति का गज जिस प्रकार गजराज नहीं हो सकता उसी प्रकार द्रव्य प्रकृति के पुरुषों में भी द्रव्याद्रव्य की सङ्कर प्रकृति का पुरुष राजपद के योग्य नहीं होता । बुद्धि के ८ गुण : उन गुणों का निरूपण— शुश्रूषा-श्रवण-ग्रहण-धारणा-विज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशा बुद्धि- गुणाः ॥ ४२ ॥ बुद्धि के आठ गुण हैं, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारणा, विज्ञान, ऊह, अपोह और तत्त्वाभिनिवेश । ( इनका स्पष्टीकरण अग्रिम सूत्रों में ग्रन्थकार ने स्वयं किया है ) श्रोतुमिच्छा शुश्रूषा ॥ ४३ ॥ शास्त्रश्रवण की इच्छा ही शुश्रूषा है । श्रवणमाकर्णनम् ॥ ४४ ॥ शास्त्रीय प्रसङ्गों का सुनना श्रवण है ।