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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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विद्यावृद्धसमुद्देशः १६ अत्यधिक पराक्रम से लोग उद्विग्न हो जायेंगे अतः क्रम-विक्रम दोनों के ही आश्रय से राज्य सुरक्षित रह सकता है । बुद्धिमान् राजा का लक्षण— क्रम-विक्रमयोरधिष्ठानं बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्वा ॥ २८ ॥ बुद्धिमान् राजा क्रम-विक्रम दोनों का आश्रय लेता है । अथवा वह अत्यन्त दृढ़ संकल्प या निश्चय वाला होता है । राजा के लिये विद्या और विनय की आवश्यकता— यो विद्या विनीतमतिः स बुद्धिमान् ॥ २९ ॥ शास्त्र ज्ञान के कारण विनीत बुद्धि वाला बुद्धिमान् है । केवल पुरुषार्थ की निन्दा— सिंहस्येव केवलं पौरुषावलम्बिनो न चिरं कुशलम् ॥ ३० ॥ सिंह के समान केवल पराक्रम करनेवाले राजा का स्थायी-कल्याण नहीं होता । बुद्धिबल होने पर भी शास्त्रज्ञान की आवश्यकता— अशस्त्रः शूर इवाशास्त्रः प्रज्ञावानपि भवति विद्विषां वशः ॥ ३१ ॥ बिना शस्त्र के शूर के समान बिना शास्त्रज्ञान के बुद्धिमान् भी राजा शत्रु के वश हो जाता है । शास्त्र तीसरे नेत्र हैं— अलोचनगोचरे ह्यर्थे शास्त्रं तृतीयं लोचनं पुरुषाणाम् ॥ ३२ ॥ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आंखों से जिस का ज्ञान हो सके उसके ज्ञान के लिये शास्त्र तीसरे नेत्र के समान हैं । शास्त्र न पढ़ने के दोष— अनधीतशास्त्रश्चक्षुष्मानपि पुमानन्ध एव ॥ ३३ ॥ शास्त्र न पढ़ा हुआ पुरुष आंख वाला होते हुए भी अन्धा है । मूर्ख पुरुष की निन्दा— न ह्यज्ञानादपरः पशुरस्ति ॥ ३४ ॥ मूर्ख पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कोई पशु नहीं है । वरमराजकं भुवनं न तु मूर्खो राजा ॥ ३५ ॥ बिना राजा का राज्य होना अच्छा है, किन्तु मूर्ख राजा का होना अच्छा नहीं है । असंस्कारं रत्नमिव सुजातमपि राजपुत्रं न नायकपदायामनन्ति साधवः ॥ ३६ ॥ खान अथवा समुद्र से उत्पन्न रत्न को जिस प्रकार बिना खरादे हुए