नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in context१६ नीतिवाक्यामृतम् राजा के अयोग्य कार्य— न पुनः शिरोमुण्डनं जटाधारणादिकं वा ॥ ३ ॥ शिर मुंड़ाना अथवा जटा आदि धारण करना राजा का काम नहीं है। राज्य का स्वरूप— राज्ञः पृथ्वीपालनोचितं कर्म राज्यम् ॥ ४ ॥ पृथ्वी पर रहने वालों का पालन-पोषण सम्बन्धी कार्य करते रहना ही राजा का राज्य है। पृथ्वी का सच्चा स्वरूप— वर्णाश्रमवती धान्य-हिरण्य-पशु-कुप्य-वृष्टिप्रदानफला च पृथ्वी ॥५॥ जिस पर चारों वर्ण और चारों आश्रमों के लोग रहते हों अनेक प्रकार के अन्न जिस पर उत्पन्न हों, और सोना-चांदी, तरह-तरह के पशु पक्षी और तांबा आदि अन्य धातुओं की प्रचुर मात्रा में जहाँ प्राप्ति हो वह पृथ्वी है। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राश्च वर्णाः ॥ ६ ॥ "आश्रम" के भेद— ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थी यतिर इत्याश्रमाः ॥ ७ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास ये चार आश्रम हैं। "उपकुर्वाणक" ब्रह्मचारी का स्वरूप— स उपकुर्वाणको ब्रह्मचारी यो वेदमधीत्य स्नायात् ॥ ८ ॥ जो वेदाध्ययन करने के अनन्तर विवाह करे उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी कहते हैं। ( स्नान की शास्त्रीय परिभाषा ) स्नान विशेष का लक्षण— स्नानं विवाहदीक्षाभिषेकः ॥ ९ ॥ विवाह संस्कार की दीक्षा के समय विशेष प्रकार के मन्त्रों से किया गया अभिषेक-जल-प्रोक्षण स्नान है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी का स्वरूप— स नैष्ठिको ब्रह्मचारी यस्य प्राणान्तिकमदारकर्म ॥ १० ॥ जो मृत्युपर्यन्त विवाह न करे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी है। पुत्र की परिभाषा— य उत्पन्नः पुनीते वंशं स पुत्रः ॥ ११ ॥ उत्पन्न होकर जो अपने सदाचार आदि से कुल को पवित्र करे वह पुत्र है।