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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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विद्यावृद्धसमुद्देशः १५ विना विचार के क्रोध का फल— अविचार्य परस्यात्मनो वाऽपायहेतुः क्रोधः ॥ ३ ॥ शत्रु की और अपनी शक्ति का विचार न करके क्रोध कर बैठना राजा के नाश का कारण बन जाता है । लोभ का स्वरूप— दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः ॥ ४ ॥ जो दान के योग्य हैं उनको दान न देना और दूसरे के धन को ले लेना लोभ है । मान का स्वरूप— दुरभिनिवेशामोक्षो यथोक्ताग्रहणं वा मानः ॥ ५ ॥ दुराग्रह न छोड़ना और शास्त्रोपदेश तथा शिष्टोपदेश को न स्वीकार करना मान है । मद का स्वरूप— कुलबलैश्वर्यरूपविद्यादिभिरात्माहङ्कारकरणं परप्रकर्षनिबन्धनं वा मदः ॥ ६ ॥ कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप और विद्या आदि का अपने में अहङ्कार रखना और दूसरे के उत्कर्ष और अभ्युदय का खण्डन करना मद है । हर्ष का स्वरूप— निर्निमित्तमन्यस्य दुःखोत्पादनेन स्वस्यार्थसंचयेन वा मनः प्रति- रञ्जनो हर्षः ॥ ७ ॥ बिना कारण ही दूसरों को दुःख देना और अर्थसंग्रह से पुलकित होना हर्ष है । इत्यरिषड्वर्गसमुद्देशः ५. विद्यावृद्धसमुद्देशः राजा का लक्षण— योऽनुकूलप्रतिकूलयोरिन्द्रयमस्थानं स राजा ॥ १ ॥ जो अपने अनुकूल आचरण करने वालों के प्रति इन्द्र के समान सुखदायक हो सके और प्रतिकूल आचरण करने वालों के प्रति यमराज के समान कठोर दण्ड दे सके वह राजा है । राजा का धर्म— राज्ञो हि दुष्टनिग्रहः शिष्टपरिपालनं च धर्मः ॥ २ ॥ दुष्टों का दमन और शिष्ट पुरुषों की रक्षा राजा का कर्त्तव्य है ।