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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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मन्त्रिसमुद्देशः ७३ इतिहास में प्रसिद्ध है कि चाणक्य ने तीक्ष्ण दूत के प्रयोग से अकेले नन्द को मार डाला था। शत्रु के द्वारा प्रेषित वस्तु लेने के विषय में विचार— शत्रुप्रहितं शासनमुपायनं च स्वैरपरीक्षितं नोपाददीत ॥ १५ ॥ शत्रु के द्वारा प्रेषित आज्ञापत्र और भेंट उपहार आदि को बिना अपने वैद्य आदि से परीक्षित कराये हुए ग्रहण न करे। दृष्टान्त— श्रूयते हि स्पर्शविषवासिताद्भुतवस्त्रोपायनेन करहाटपतिः कैटभो वसुनामानं राजानमाशीविष-विषोपेतरत्नकरण्डकप्राभृतेन च करवालः करालं जघानेति ॥ १६ ॥ सुना जाता है कि स्पर्श-विष से वासित अद्भुत वस्त्र की भेंट देकर करहाट देश के राजा कैटभ ने वसु नामक राजा को तथा सर्प विष से संयुक्त रत्न की पिटारी का उपहार देकर करवाल नामक राजा ने कराल नामक राजा को मार डाला था। दूत की अवध्यता— महत्यपकारेऽपि न दूतमुपहन्‍यात् ॥ १७ ॥ बहुत बड़ा अपकार करने पर भी दूत का वध न करे। उद्धृतेष्वपि शस्त्रेषु दूतमुखा वै राजानः ॥ १८ ॥ शस्त्र उठ जाने पर भी अर्थात् लड़ाई छिड़ जाने पर भी राजाओं की परस्पर वार्ता दूतों के द्वारा ही होती है। तेषामन्त्यावसायिनोऽप्यवध्याः किमङ्ग पुनर्ब्राह्मणः ॥ १९ ॥ दूत नीच जाति का हो तब भी अवध्य है फिर ब्राह्मण के विषय में तो कहना ही क्या है? वध्याभावाद् दूताः सर्वं जल्पन्ति ॥ २० ॥ वध्य न होने के कारण दूत कहने न कहने योग्य सभी बातों को कहता है। कः सुधीर्दूतवचनात् परोत्कर्षं स्वात्मापकर्षं च मन्येत ॥ २१ ॥ कौन बुद्धिमान् दूत के कहने मात्र से शत्रु की उत्कृष्टता और अपनी हीनता मानता है? शत्रु दूत का परीक्षण— तदाशयरहस्यपरिज्ञानार्थं परदूतः स्त्रीभिरुभयवेतनैः तद्गुणाचार- शीलानुवर्तिभिर्वा प्रणिधातव्यः ॥ २२ ॥ शत्रु के आशय और गुप्त भेदों को जानने के लिये शत्रु के दूत को स्त्रियों