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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages

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७४ नीतिवाक्यामृतम् के द्वारा, दोनों ओर से वेतन पाने वाले दूतों के द्वारा अथवा उसके शील और आचार आदि का आचरण करने वालों के द्वारा अपने वश में करे । शत्रु के लिये पत्र भेजने का प्रकार— चत्वारि वेष्टनानि खड्गमुद्रा च प्रतिपक्षलेखानाम् ॥ २३ ॥ शत्रु के लिये लेखों-पत्र आदि को चार वेष्टनों में लपेटे और ऊपर से अपने तलवार की मुद्रा लगा दे । [ इति दूत समुद्देशः ] १४. चारसमुद्देशः गुप्तचरों का महत्त्व— स्वपरमण्डलकार्याकार्यावलोकने चाराश्चक्षूंषि क्षितिपतीनाम् ॥ १ ॥ अपने और शत्रु के मण्डल ( जिले ) का भला और बुरा काम देखने के लिये राजाओं के गुप्तचर ही उनके नेत्र हैं । गुप्तचर के गुण— अलौल्यममान्द्यममृषाभाषित्त्वमभ्यूहकत्वं चेति चारगुणाः ॥ २ ॥ चाञ्चल्य न होना, आलस्य न होना, झूठ न बोलना और शत्रु के मर्मज्ञान की क्षमता का होना, ये गुप्तचर के गुण हैं । गुप्तचर सम्बन्धी अन्य विचार— तुष्टिदानमेव चाराणां वेतनम् ॥ ३ ॥ सन्तुष्टि पर्यन्त पुरस्कार देना ही गुप्तचरों का वेतन है । तेहि तल्लोभात् स्वामिकार्येष्वतीव त्वरन्ते ॥ ४ ॥ पुरस्कार के लोभ से वे स्वामी के कार्य को अधिक शीघ्रता के साथ करते हैं । सन्दिग्धविषये त्रयाणामेकवाक्ये संप्रत्ययः ॥ ५ ॥ एक गुप्तचर की बातों से जब किसी विषय में सन्देह होता हो तो तीन गुप्तचरों के ऐकमत्य से निश्चय करना चाहिए । अनवसर्पो हि राजा स्वैः परैश्चातिसंधीयते ॥ ६ ॥ गुप्तचरहीन राजा अपने आदमियों से और शत्रुओं के द्वारा वञ्चित होता हैं । किमस्त्ययामिकस्य निशि कुशलम् ॥ ७ ॥ जिसके पास रात को पहरा देने वाला आदमी नहीं है क्या उसकी रात