नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in context८० नीतिवाक्यामृतम् व्यक्तित्व और वाणी का सम्बन्ध— वक्तृगुणगौरवाद् वचनगौरवम् ॥ १७ ॥ बोलनेवाले के गुणों की गुरुता के कारण उसकी वाणी का गौरव होता है। धन के उपयोग के विषय में— किं मितम्पचेषु धनेन चण्डालसरसि वा जलेन यत्र सतां नोप- भोगः ॥ १८ ॥ अपने ही भोजन भर को थोड़ा सा पकाने वाले अर्थात् कृपण पुरुष को धन होने से और चण्डाल के तालाब में जल होने से क्या लाभ है जब कि सामान्यरूप से सत् पुरुष उसका उपभोग नहीं कर सकते । जनता की गतानुगति— लोकस्तु गतानुगतिको यतोऽसौ सदुपदेशिनीमपि कुट्टिनीं धर्मेषु न तथा प्रमाणयति यथा गोघ्नमपि ब्राह्मणम् ॥ १९ ॥ संसार गतानुगतिक अर्थात् 'देखा-देखी' काम करने वाला है, जैसा एक करता है वैसा ही दूसरे भी करने लगते हैं। क्योंकि कुट्टिनी-वेश्या धर्म के सम्बन्ध में कैसा भी सदुपदेश क्यों न दे लोग उसे वैसा न मानेंगें जैसा गौ के भी हत्यारे ब्राह्मण के उपदेश को । [ इति विचारसमुद्देशः ] १६. व्यसन समुद्देश व्यसन और उसका भेद— व्यस्यति पुरुषं श्रेयसः इति व्यसनम् ॥ १ ॥ व्यक्ति को कल्याण मार्ग से विचलित अथवा भ्रष्ट करनेवाले कार्यों का नाम व्यसन है । व्यसनं द्विविधं सहजमाहार्यं च ॥ २ ॥ व्यसन दो प्रकार के हैं : १. सहज २. आहार्य अर्थात् एक स्वाभाविक, दूसरा दूसरों को द्यूत, मद्यपान आदि में प्रवृत्त देखकर स्वयं भी उसमें पड़ना । सहज व्यसन को दूर करने के उपाय— सहजं व्यसनं धर्मसंभूताभ्युदयहेतुभिरधर्मजनितमहाप्रत्यवायप्रति- पादनैरुपाख्यानैर्योगपुरुषैश्च प्रशमं नयेत् ॥ ३ ॥ मनुष्य को चाहिए कि वह अपने सहज व्यसनों को धर्ममूलक कल्याण- कारी साधनों और उपायों से और अधर्म से होने वाले महान् सङ्कटों को