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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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[ ११ ] न्यायदर्शन की विशेषताएं न्यायदर्शन अपनी प्रमाण-विचार की इस विलक्षण पद्धति के कारण ही उच्च तथा महान् है। प्रमाण-विचार पर ही उसका समग्र दार्शनिक मत आधृत है। प्रायः अन्य दर्शनों पर पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा यह आक्षेप किया जाता है कि ये दर्शन केवल श्रुति- वाक्यों (शब्दप्रमाण) पर आधृत हैं, इनके पास अपना मत सिद्ध करने के लिये कोई दृढ तर्क (युक्ति) नहीं; परन्तु न्यायदर्शन पर यह आक्षेप लगाने का कौन साहस कर सकता है ! न्यायदर्शन में प्रमाण तथा प्रमेय सम्बन्धी सभी छोटे-बड़े प्रश्नों का तर्कप्रसूत समाधान मिलता है। यह दर्शन अपने प्रमाण-विचार की सूक्ष्म पद्धति से ही तत्त्वज्ञान तक पहुँचने का प्रयत्न करता है, इसी के द्वारा विरोधिमतों का खण्डन भी करता है। इस दर्शन के अनुसार इस संसार में परमाणु, मन, आत्मा तथा ईश्वर नामक अनेक स्वतन्त्र सत्तायें हैं जो दिक्, काल तथा आकाश में परस्पर भिन्नतया स्थित हैं। यह समग्र विश्व में ईश्वर की ही परम सत्ता का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता, अतः इसे अद्वैतवादी दार्शनिक भले ही अपने से कुछ हीन समझ लें; परन्तु इस दर्शन ने जो बातें युक्तियों द्वारा रखी हैं उसके विरुद्ध वे केवल आप्त वचन के आधार पर प्रतिज्ञामात्र से कैसे सिद्ध कर सकते हैं ! हम तो यह मानते हैं कि न्यायदर्शन का यह आस्तिकवाद ही आज के युग में हम लोगों के लिये अत्यधिक शिक्षाप्रद तथा एक प्रकार से मार्ग- दर्शक है। न्याय तथा वैशेषिक दर्शन में साम्य महर्षि कणाद-प्रणीत वैशेषिक दर्शन भी न्यायदर्शन का 'समान तन्त्र' है। वह भी सप्त पदार्थों के तत्त्वज्ञान से ही निःश्रेयसाधिगम मानता है। यों कहिये कि उस दर्शन के भी अभिधेय, प्रयोजन तथा सम्बन्ध वही हैं जो न्यायदर्शन के हैं, अतः दार्शनिकों के समूह में ये दोनों एक ही कहलाते हैं। अर्थात् वैशेषिकदर्शन में आत्मादि प्रमेयों की सिद्धि मुख्यतः अनुमान से की गयी है, अतः अन्य दार्शनिक वैशेषिक को भी न्याय- शास्त्र ही कह देते हैं। परन्तु उस दर्शन में पदार्थनिरूपण में सामान्य तथा विशेष पदार्थों का विशेष (अधिक) निरूपण है, अतः उसे इसी आधार पर 'वैशेषिक' कहते हैं। एक बात और, कणाद अपने 'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः' इस सूत्र के आधार पर यह मानते हैं कि वेदविहित धर्म के श्रवण-मनन के साथ-साथ पदार्थ तत्त्वज्ञान से 'अपवर्ग' होता है, केवल पदार्थों के तत्त्वज्ञान से नहीं। जबकि अक्षपाद अपने दर्शन में 'धर्म' का ऐसा कोई बन्धन नहीं लगाते। 'न्याय' से यह धर्म-विशेषता होने के कारण भी उस दर्शन का नाम 'वैशेषिक दर्शन' पड़ा। सूत्रकार की शैली अक्षपाद अपनी बात कहने के लिये उनके समय में प्रचलित सूत्रपद्धति ही अपनाते हैं। फिर भी हम देखते हैं कि अन्य सूत्रकारों की अपेक्षा उतने लघु वाक्यों में भी

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