BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 14 of 410

Read in context
Page 14

[ १२ ]

वे अधिक सफल हुए हैं। सम्पूर्ण न्यायसूत्रों में सब मिलाकर १०-१५ सूत्र ही ऐसे जहाँ उस सूत्र का 'अर्थादापन्न' वाक्यावयव छूटा हो; अन्यथा आचार्य ने प्रत्येक सूत्र में यह ध्यान रखा है वह अपने आप में बिना किसी 'अर्थापत्ति' के ही अपना असन्दिग्ध अर्थ बताये। यह आवश्यक भी था; क्योंकि ज्ञात होता है कि न्याय-सूत्रों का प्रणयन उस समय हुआ, जब विरोधी दार्शनिक (जैन, बौद्ध आदि) अपनी बात को जनता की सरल भाषा में जनता की विचारणा के ढंग से जनता के सामने रखने में समर्थ हो रहे थे, तथा उसमें उन्हें सफलता भी मिलती जा रही थी। इस पृष्ठभूमि के रहते अक्षपाद के सामने भी यही मार्ग था कि वह भी जनता की भाषा में, जनता के हितार्थ, जनता की विचारणा के ढंग से ही जनता के सामने अपनी बात को रखते । यह तो स्पष्ट है कि अक्षपाद के प्रधान विरोधी बौद्ध दार्शनिक थे; वे ईश्वर, बाह्यार्थ तथा नित्यता आदि का खण्डन प्रबलतम युक्तियों से कर रहे थे; उधर चार्वाक उसके साथ-साथ 'कर्म' को भी 'अर्धचन्द्रिका' दे रहे थे। वह समय मीमांसकों या वेदान्तियों की तरह वेद की शपथ खाने का नहीं था; अपितु उन्हीं की तरह, उन्हीं की भाषा में, उन्हीं की युक्तियों से जनता को यह समझाना आवश्यक था कि 'ईश्वर' तथा 'कर्म' भी मानव जीवन में 'कुछ' हैं। यही कारण ज्ञात होता है कि अक्षपाद ने विरोधी तथा स्वपक्ष (मीमांसा, वेदान्त)—दोनों का ही मार्ग छोड़कर एक मध्यम मार्ग पकड़ा, जो 'ईश्वर' को सब कुछ का कर्ता-धर्ता बताकर मानव को 'अलस' न बना दे, न जैन या बौद्धों की तरह उसे कुछ भी न मानकर मानव को 'उद्दण्ड' बना दे, और न चार्वाकों की तरह 'कर्म' को कुछ भी न मानकर मानव को एक 'शिश्नोदर- परायण पशु' बना दे। अतः अक्षपाद ने समय को पहचान कर 'ईश्वर' की सत्ता प्रबल तर्कों से सिद्ध करके भी उसे सृष्ट्युपादान कारण नहीं माना, उसे 'सर्वस्वतन्त्र' नहीं माना; अपितु यों कहिये कि उसे जनतन्त्र के संवैधानिक सर्वोच्च पद पर अधिष्ठित किया, दूसरे अपने ही वर्ग के दार्शनिकों की तरह उसे 'अधिनायक' कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ नहीं माना, यह पद उन्होंने 'कर्म' को दिया। यह उचित भी था, क्योंकि यही बात तर्क से सिद्ध होती है। यह तर्क इस ग्रन्थ में यथाप्रसङ्ग अनेकधा देखने को मिलेगा। भाष्यकार वात्स्यायन 'सूत्रपद्धति' में संक्षिप्ततादोष तो है ही। वाक्य कितना भी स्पष्टार्थ क्यों न हो यदि वह लघु है तो यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक साधारण जन उसका वही अर्थ समझे जो सूत्रकार को अभिप्रेत हो। इसके लिये उस सूत्र की अधिकारी पुरुष द्वारा कुछ व्याख्या की आवश्यकता पड़ती है, जो सूत्रकार के हृदय को सम्यक्तया समझ चुका हो। न्यायसूत्रों की व्याख्या वात्स्यायन ने अपने भाष्य के रूप में जैसी की है, उससे प्रत्येक जिज्ञासु सन्तुष्ट हो सकता है। यह शैली 'नातिह्रस्वा, नातिदीर्घा' है, इससे जिज्ञासु अर्थानवबोध के कारण न तो असन्तुष्ट होता है, न अतिविस्तार के कारण घबराता ही