BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 15 of 410

Read in context
Page 15

है। वात्स्यायन ने प्रश्नोत्तर के रूप में, वादी प्रतिवादी के संवाद-रूप में जैसे सूत्रकार का अभिप्राय समझाया है, ऐसा उदाहरण 'पातञ्जल महाभाष्य' के अतिरिक्त अन्य भाष्यों में अधिक नहीं मिलता। विषय पर पूर्ण अधिकार, भाषा सरल, नपे-तुले शब्द, स्थान-स्थान पर लौकिक उपमा तथा मुहावरों का स्वच्छन्द प्रयोग—ये सब मिल कर विषय की शुष्कता को अपसारित किये रहते हैं। इतने पर भी सूत्रकार के प्रति अगाध श्रद्धा कि समग्र भाष्य में किसी भी सूत्र के किसी भी शब्द के खण्डन के लिए एक वाक्य भी प्रयुक्त नहीं। यह विनय हम इस भाष्यकार में ही देखते हैं, या फिर महाभाष्यकार पतञ्जलि में। अस्तु। न्याय-सूत्रों की रचना वात्स्यायन ने अपने भाष्य में अत्यधिक स्थलों पर ऐसे लघु वाक्यों का प्रयोग किया है कि उन वाक्यों के सूत्र होने का सन्देह होता है। भाष्यकार की यह शैली है कि वे सूत्र का अक्षरार्थ कर पुनः विस्तृत व्याख्यान करने के लिए अपनी बात को पहले संक्षेप (एक वाक्य) में रखते हैं, फिर उसका अनेक वाक्यों में व्याख्यान करते कि ये संक्षिप्त वाक्य प्रारम्भ में जैसे रहे हों आगे चलकर न्यायदर्शन के सूत्रों का नियत रखने में बाधक बन बैठे। कारण कि, प्रतिपक्षी दार्शनिक जब नैयायिकों के तर्कों से पराभूत होने लगे तो उन्होंने भी इन न्यायसूत्रों में स्वमतपोषक सूत्र बना बनाकर प्रक्षिप्त करने आरम्भ कर दिये। अन्त में वाचस्पति मिश्र ने अपनी अनुपम प्रतिभा तथा प्रगाढ पाण्डित्य का प्रयोग कर इन सूत्रों का प्रामाणिक संग्रह 'न्यायसूची-निवन्ध' नाम से प्रकरणानुसार निबद्ध कर दिया। इस तरह विरोधियों के आक्रमण पर तो अर्गला लग गयी, परन्तु घर में ही ऐसा विवाद हो गया कि जो आजतक शान्त नहीं हो सका। विरोधियों की बात जाने भी दें तो भी हम नहीं समझ पाये कि नैयायिकपरम्परा के प्रामाणिक व्याख्याताओं के भी सूत्रसंग्रह क्यों नहीं मिल पाते। वार्त्तिककार उद्योतकर के व्याख्यात सूत्र उतने ही नहीं हैं जितने उसके व्याख्याकार वाचस्पति मिश्र ने माने हैं; यही दशा उदयन की है, 'तात्पर्यपरिशुद्धिकार' उदयन को प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर लिखना पड़ा है कि 'यह सूत्र नहीं भाष्य है' या 'यह भाष्य नहीं सूत्र है'। विश्वनाथ चक्रवर्ती भी उतने सूत्रों को नहीं लेते, जितनों के लिये वाचस्पति मिश्र प्रतिज्ञा करते हैं कि 'इतने सूत्र हैं'। यही मनोदशा भाष्यचन्द्रकार रघूत्तम की है। दूर क्यों जायें—हम अपनी ही कहें, हमने यह अनुवाद करते समय यह धारणा बनायी थी कि वाचस्पति मिश्र का 'सूत्रसंग्रह' प्रामाणिक है, हमें इसी के अनुसार सूत्र रखने हैं, तथापि पञ्चाधिक स्थलों पर हम भी उस पिच्छिल राजपथ से विचलित हो गये; क्योंकि वहाँ हम प्रकरणानुसार उन्हें सूत्र मानने के लिये विवश हैं, परन्तु वे सूत्र 'न्यायसूचीनिबन्ध' में परिगणित नहीं हैं। बहुत कुछ ऊहापोह के बाद हम इसी निष्कर्ष