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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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पर पहुँचे हैं कि वाचस्पति मिश्र का मुख्य लक्ष्य इतना ही था कि विरोधियों द्वारा प्रक्षिप्त दर्शनविरोधी सूत्रों को निकाल कर प्रामाणिक सूत्रसंग्रह बनाया जाये। यदि कोई विद्वान् कहीं सूत्रानुकूल भाष्यवाक्य को सूत्र समझकर व्याख्यान कर ही दे तो उससे वस्तुतत्त्व में क्या अन्तर आयेगा ! भाषान्तर के विषय में दो बात हम कोई बहुत बड़े नैयायिक नहीं, न सर्वतन्त्रस्वतन्त्र विद्वान् हैं; फिर भी न्याय- दर्शन ऐसे महत्त्वशाली ग्रन्थ को स्पर्श कर हमने कोई बहुत अधिक मूर्खता नहीं की ! विचारशील मानव अपने प्रारम्भ के क्षणों (अध्ययनकाल) में अपने जीवन के कुछ लक्ष्य निर्धारित करता है, उन्हें पूर्ण करने के लिये वह तभी से प्रयास प्रारम्भ कर देता है। अपनी भी यही मनोदशा थी। विद्यालयों में बैठ कर जब अध्ययन होता था तो स्थल- स्थल पर यह भाव उठते थे कि विवादास्पद विषयों (शास्त्रार्थ) को छोड़ कर कोई इस ग्रन्थ का अध्ययन इतना भी करा देता कि ग्रन्थ का तत्त्वबोध भी हो जाता और व्यर्थ के भार से भी बच जाते । तभी हमने यह निश्चय किया था कि इन पुस्तकों का ऐसा हिन्दी रूपान्तर या संस्कृत की सरल टीका कर देनी है जो व्युत्पन्न विद्यार्थी को अत्यधिक स्वावलम्बी बना सके । इस अनुवाद को लिखते समय हमने अपनी विद्यार्थिकाल की मनोदशा को प्रतिक्षण ध्यान में रखा है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारा यह प्रयास हमारे ही समानधर्मा विद्याव्यसनियों के लिये है। हो सकता है, एकाधिक स्थलों पर हम से कुछ प्रमाद हो गया हो; परन्तु यदि मित्रगण अध्ययन-अध्यापन के समय आयी असुविधाओं को हमें सूचित करते रहेंगे तो इसके आगामी संस्करण तथा अन्य दर्शनों के हिन्दी-रूपान्तर में उनका परिमार्जन अवश्य कर देंगे । अनुवाद को आद्योपान्त पढने पर अनुवाद की भाषा के विषय में हमारे विचार स्पष्टतः आप के सामने आ जायेंगे-ऐसी हमें आशा है। हम मिश्रित हिन्दी ( सरल हिन्दी ) में विश्वास नहीं रखते। दर्शन के कुछ गूढ तथा पारिभाषिक शब्द हैं, कुछ श्रद्धेय वाक्य हैं, कुछ प्रबल तर्क हैं जो चालू भाषा में प्रयुक्त किये जाने पर अपना महत्त्व विनष्ट कर बैठते हैं, उनकी गुरुता समाप्त हो जाती है। अतः हम विवश थे कि भाषा को निम्नस्तर तक न पहुँचने दें। फिर भी हमने भाषा को प्रवाहित रखने का प्रयास किया है। हमारा सौभाग्य यह था कि वात्स्यायन भाष्य, जिसका हमें अनुवाद करना था, बहुत प्राञ्जल भाषा में है; उससे भी अत्यधिक अवलम्ब मिला ।

$\left.\begin{aligned} कार्तिकी पूर्णिमा, २०२३ वि० वाराणसी \end{aligned}\right}$ $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ विद्वद्वशंवद $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री