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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० वर्णसमुदायविकारानुपपत्तिवच्च वर्णविकारानुपपत्तिः। 'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२) 'ब्रुवो वचिः' (२. ४. ५३) इति यथा वर्णसमुदायस्य धातुलक्षणस्य क्वचिद्विषये वर्णान्तरसमुदायो न परिणामो न कार्यम्, शब्दान्तरस्य स्थाने शब्दान्तरं प्रयुज्यते। तथा वर्णस्य वर्णान्तरमिति ॥ ४० ॥ २. इतश्च न सन्ति विकाराः— प्रकृतिविवृद्धौ विकारविवृद्धेः ॥ ४१ ॥ प्रकृत्यनुविधानं विकारेषु दृष्टम्, यकारे ह्रस्वदीर्घानुविधानं नास्ति, येन विकारत्वमनुमीयत इति ॥ ४१ ॥ न्यूनसमाधिकोपलब्धेर्विकाराणामहेतुः ? ॥ ४२ ॥ द्रव्यविकारा न्यूनाः समा अधिकाश्च गृह्यन्ते। तद्द्वयं विकारो न्यूनः स्यादिति ? ॥ ४२ ॥ द्विविधस्यापि हेतोरभावादसाधनं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥ अत्र नोदाहरणसाधर्म्याद्धेतुरस्ति; न वैधर्म्यात्। अनुपसंहृतश्च हेतुना दृष्टान्तो न साधक इति। वर्णसमुदायविकारानुपपत्ति की तरह यह वर्णविकारानुपपत्ति भी मान लेनी चाहिये। जैसे—'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२), 'ब्रुवो वचिः' (पा० सू० २. ४. ५३) यह धातुलक्षण वर्णसमुदाय का किसी विषय में होने वाला वर्णसमुदाय (वचि) न परिणाम है, न विकार; बस, दूसरे शब्द के स्थान में दूसरा शब्द प्रयुक्त हो जाता है— इतना ही सिद्धान्त है। इस नय से दूसरे वर्ण के स्थान में दूसरा वर्ण प्रयुक्त होता है— यही सिद्धान्त है ॥ ४० ॥ २. वर्ण इसलिये भी विकार नहीं है— प्रकृति की विवृद्धि होने से विकार की विवृद्धि होने के कारण ॥ ४१ ॥ विकारों में प्रकृत्यनुविधान देखा जाता है; परन्तु यहाँ यकार में दीर्घादि की अनु- वृत्ति नहीं देखी जाती, जिससे यकार में विकारत्व का अनुमान न हो सके ॥ ४१ ॥ न्यून, सम तथा अधिक उपलब्धि से यहाँ विकारों का हेतुत्व नहीं बनता ? ॥४२॥ लोक में जैसे द्रव्यविकार में न्यूनता समता या अधिकता देखी जाती हैं वैसे इन वर्णों में विकार न्यून हो सकता है। अतः विकार का साधक कोई हेतु नहीं हैं ॥ ४२ ॥ दोनों प्रकार के हेतुओं के अभाव से दृष्टान्त असाधक है ॥ ४३ ॥ यहाँ न तो उदाहरणसादृश्य से हेतु है और न उदाहरणवैसादृश्य से। अतः हेतु से अनुपसंहृत दृष्टान्त साधक नहीं होता। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri