न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context४६. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६१ प्रतिदृष्टान्ते चानियमः प्रसज्येत, यथा-अनडुहः स्थानेऽश्वो वोढुं -नियुक्तो न तद्विकारो भवति, एवमिवर्णस्य स्थाने यकारः प्रयुक्तो न विकार इति । न चात्र नियमहेतुरस्ति दृष्टान्तः साधको न प्रतिदृष्टान्त इति ॥ ४३ ॥ द्रव्यविकारोदाहरणं च— न; अतुल्यप्रकृतीनां विकारविकल्पात् ॥ ४४ ॥ अतुल्यानां द्रव्याणां प्रकृतिभावोऽवकल्पते, विकाराश्च प्रकृतीरनुविधीयन्ते । न त्विवर्णमनुविधीयते यकारः । तस्मादनुदाहरणं द्रव्यविकार इति ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकारवैषम्यवद् वर्णविकारविकल्पः ? ॥ ४५ ॥ यथा द्रव्यभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारवैषम्यम्, एवं वर्णभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारविकल्प इति ? ॥ ४५ ॥ न; विकारधर्मानुपपत्तेः ॥ ४६ ॥ अयं विकारधर्मो द्रव्यसामान्ये-यदात्मकं द्रव्यं मृद्वा सुवर्णं वा, तस्यात्म- नोऽन्वये पूर्वो व्यूहो निवर्त्तते व्यूहान्तरं चोपजायते, तं विकारमाचक्ष्महे । न वर्णसामान्ये कश्चिच्छब्दात्माऽन्वयी-य इत्वं जहाति यत्वं चापद्यते । तत्र यथा प्रतिदृष्टान्त में अनियम-प्रसक्ति भी होने लगेगी, जैसे गाड़ी में बैल के स्थान पर घोड़ा जोत दिया जाये तो वह उसका विकार थोड़े हो जायेगा ! इसी तरह इवर्ण के स्थान में यकार का प्रयोग हो तो वह विकार कैसे हुआ ! अतः यहाँ न तो नियमसाधन का दृष्टान्त ही साधक है, न प्रतिदृष्टान्त ॥ ४३ ॥ यहाँ द्रव्यविकार का उदाहरण भी— नहीं; असमान द्रव्यों के विकारविकल्प से ॥ ४४ ॥ अपने से असमान जातीय द्रव्यों में प्रकृतिभाव क्लृप्त है, परन्तु वहाँ विकार प्रकृति का अनुविधान ( अनुवृत्ति ) करते हैं; यहाँ तो इवर्ण का यकार अनुविधान नहीं करता, अतः यहाँ द्रव्यविकार उदाहरण नहीं बन सकता ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकार के वैषम्य की तरह वर्णविकारविकल्प मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ जैसे द्रव्यत्वेन समान प्रकृति में विकार-विषमता देखी जाती है; इसी तरह यहाँ वर्णभाव से समान प्रकृति का विकारविकल्प क्यों न मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ विकारधर्मानुपपत्ति के कारण नहीं मान सकते ॥ ४६ ॥ द्रव्यसामान्य में विकारधर्म यह है कि जैसा द्रव्य हो—मिट्टी हो या सुवर्ण हो, तदात्मक में अन्वय होने पर पूर्व पिण्डाद्याकृति निवृत्त हो जाती है, तथा कुण्डलाद्याकृति उत्पन्न हो जाती है—इसे विकार कहते हैं । वर्णसामान्य में कोई शब्दात्मा सुवर्ण व्यक्ति की तरह अन्वयी नहीं, जो इत्व को छोड़ दे और यत्व को ग्रहण कर ले ! वहाँ जैसे द्रव्यत्वेन समान होने पर भी विकारवैषम्य होने पर घोड़ा जैसे बैल नहीं हो पाता, न्या० द० २१