न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० वस्यति-‘अज्ञासिषम्’ इति। एवं स्मृतिमपि त्रिकालविशिष्टां सुस्मूर्षाविशिष्टां च प्रतिसन्धत्ते। संस्कारसन्ततिमात्रे तु सत्त्वे उत्पद्योत्पद्य संस्कारास्तिरोभवन्ति । स नास्त्येकोऽपि संस्कारो यस्त्रिकालविशिष्टं ज्ञानं स्मृतिं चानुभवेत् । न चानुभव- मन्तरेण ज्ञानस्य स्मृतेश्च प्रतिसन्धानमहं ममेति चोत्पद्यते, देहान्तरवत्। अतोऽ- नुमीयते-‘अस्त्येकः सर्वविषयः प्रतिदेहं स्वज्ञानप्रबन्धं स्मृतिप्रबन्धं च प्रतिसन्धत्ते’ इति। यस्य देहान्तरेषु वृत्तेरभावान्न प्रतिसन्धानं भवतीति ॥ १४ ॥ आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् [ १५-१७ ] न; आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् ? ॥ १५ ॥ न देहादिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा। कस्मात् ? आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् । ‘दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्’ ( ३.१.१. ) इत्येवमादीनामात्म- प्रतिपादकानां हेतूनां मनसि सम्भवः; यतः मनो हि सर्वविषयमिति । तस्मान्न शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मेति ? ॥ १५ ॥ ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः संज्ञाभेदमात्रम् ॥ १६ ॥ करता हुआ बहुत देर तक कोई एकतरफा फैसला न करके अन्त में अचानक निश्चय करता है कि 'अरे, इसे तो मैं जानता था !' इसी तरह त्रिकालविशिष्ट तथा स्मरणेच्छा- विशिष्ट स्मृति का भी यह आत्मा प्रतिसन्धान करता है। स्मृत्यनुभवक्रियाकारक को संस्कार-सन्ततिधारामात्र मानेंगे तो संस्कार उत्पन्न हो हो कर विनष्ट हो जाते हैं, तो ऐसा एक भी संस्कार कहाँ मिलेगा जो त्रिकालविशिष्ट ज्ञान तथा स्मृति का अनुभव कर सके ! अनुभव के बिना ज्ञान तथा स्मृति का देहान्तर में 'मैं—मेरा' ऐसे प्रतिसन्धान की तरह प्रतिसन्धान बन नहीं सकता । अतः अनुमान होता है—अवश्य कोई एक प्रमाता है जो बाह्यान्तरभूत सब विषयों का ग्राहक है, तथा अपने प्रत्येक देह में ज्ञानप्रबन्ध तथा स्मृतिप्रबन्ध का चिन्तन करता है। जिसकी देहान्तर में वृत्ति न मानेंगे तो यह ज्ञान-स्मृतिचिन्तन सिद्ध नहीं होगा ॥ १४ ॥ शंका— आत्मा नहीं है, आत्मा के साधक हेतुओं के मन में सम्भव होने से ? ॥ १५ ॥ देहादिसंघात से अतिरिक्त आत्मा नहीं हैं; क्योंकि सिद्धान्ती द्वारा आत्मा के साधन में दिये गये हेतुओं से मन का ही सम्बन्ध है। 'दर्शन-स्पर्शन द्वारा एक अर्थ के ग्रहण से' ( ३. १. १. ) आदि हेतुओं से आत्मा के स्थान में मनकी ही सिद्धि हो पायेगी; क्योंकि मन भी सर्व विषय का ग्राहक है। अतः हम यह क्यों न मान लें—'शरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- संघात से पृथक् कोई आत्मा नामक पदार्थ नहीं हैं' ? ॥ १५ ॥ उत्तर— ज्ञाता से ज्ञानसाधन उपपन्न होने के कारण यह संज्ञाभेदमात्र है ॥ १६ ॥