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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१७. सू० ] आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८७ ज्ञातुः खलु ज्ञानसाधनान्युपपद्यन्ते—चक्षुषा पश्यति, घ्राणेन जिघ्रति, स्पर्श- नेन स्पृशति । एवं मन्तुः सर्वविषयस्य मतिसाधनं मनःकरणभूतं सर्वविषयं विद्यते येनायं मन्यत इति । एवं सति ज्ञातर्यात्मसंज्ञा न मृष्यते, मनःसंज्ञाऽभ्यनु- ज्ञायते; मनसि च मनःसंज्ञा न मृष्यते, मतिसाधनंत्वभ्यनुज्ञायते, तदिदं संज्ञा- भेदमात्रम्, नार्थे विवाद इति । प्रत्याख्याने वा सर्वेन्द्रियविलोप्रप्रसङ्गः । अथ मन्तुः सर्वविषयस्य मति- साधनं सर्वविषयं प्रत्याख्यायते नास्तीति ? एवं रूपादिर्विषयग्रहणसाधनान्यपि न सन्ति इति सर्वेन्द्रियविलोप्रः प्रसज्यत इति ॥ १६ ॥ नियमश्च निरनुमानः ॥ १७ ॥ योऽयं नियम इष्यते—'रूपादिग्रहणसाधनान्यस्य सन्ति, मतिसाधनं सर्वविषयं नास्ति' इति, अयं नियमो निरनुमानः । नात्रानुमानमस्ति येन नियमं प्रतिपद्यामह इति । ज्ञाता से ज्ञानसधनों को प्रामाण्य मिलता है, जैसे—'आंख से देखता हैं', 'नाक से सूंघता हैं', त्वक् से स्पर्श करता हैं'। इसी तरह मन्ता ( चक्षुरादिकरण-दर्शनक्रिया- कर्ता ) से सर्वविषयक मतिसाधन उपपन्न होते हैं, उनमें मन भी उसकी मति में साधन है, जिससे वह सब विषयों पर मनन करता है, तो मन की स्वीकृति से आत्मा का प्रतिषेध कैसे कर सकोगे ! यह कैसी विडम्बना है कि अपनी पराजय छिपाने के लिये उस ज्ञाता को 'मन' संज्ञा तो दे देना चाहते हो, पर उसे 'आत्मा' मानने में आपको संकोच लग रहा है ! मन को भी 'मन' नाम नहीं देना चाहते, पर उस का मतिसाधनत्व स्वीकार करते चले आ रहे हो ! तो यह केवल नाम पर अडंगा लगाया जा रहा है, आत्मा की सत्ता तो आप को भी स्वीकार है ही । और यदि आत्मा के प्रतिषेध पर ही तुले हुए हो तो आपके मत में सब इन्द्रियों के विलोप ( अभाव ) की स्थिति आ पड़ेगी ! क्योंकि सर्वविषयग्राहक मन्ता का मतिसाधन तथा उसके सर्वविषयक प्रत्याख्यान पर आग्रह करोगे तब भी इन्द्रियविलोप की स्थिति का सामना करना अभीष्ट है तो इस तरह रूपादिविषयज्ञान के साधन ही न रह जायेंगे, अतः इन्द्रियविलोप स्पष्ट ही है ॥ १६ ॥ यह नियम अनुमान प्रमाण से सिद्ध नहीं होता ॥ १७ ॥ यह जो नियम बनाना चाह रहे हो—'ज्ञाता के रूपादिविषय ज्ञान के साधन तो हैं, परन्तु मतिसाधन (सुखादिज्ञानकरण, मन ) सर्वविषय वाला नहीं हैं', यह नियम नहीं बनेगा; क्योंकि यह निरनुमान है। अर्थात् ऐसा कोई अनुमान नहीं, जिससे इस नियम को प्रमाणित कर सकें। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri