न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० रूपादिभ्यश्च विषयान्तरं सुखादयः, तदुपलब्धौ करणान्तरसद्भावः। यथा चक्षुषा गन्धो न गृह्यत इति करणान्तरं घ्राणम्, एवं चक्षुर्घाणाभ्यां रसो न गृह्यत इति करणान्तरं रसनम्, एवं शेषेष्वपि । तथा चक्षुरादिभिः सुखादयो न गृह्यन्त इति करणान्तरेण भवितव्यम् । तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम् । यच्च सुखाद्युपलब्धौ करणं तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम्, तस्येन्द्रियमिन्द्रियं प्रति सन्निधे- रसन्निधेश्च न युगपज्ज्ञानान्युत्पद्यन्ते इति । तत्र यदुक्तम्—'आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात्' इति तदयुक्तम् ॥ १७ ॥ आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १८-२६ ] किं पुनरयं देहादिसङ्घातादन्यो नित्यः ? उतानित्य इति ? कुतः संशयः ? उभयथा दृष्टत्वात् संशयः । विद्यमानमुभयथा भवति— नित्यम्, अनित्यं च । प्रतिपादिते चात्मसद्भावे संशयानिवृत्तेरिति । आत्मसद्भावहेतुभिरेवास्य प्राग्देहभेदादवस्थानं सिद्धमूर्ध्वमपि देहभेदाद- वतिष्ठते । कुतः ? पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः ॥ १८ ॥ रूपादि से सुखादि भिन्न विषय हैं, उनके ज्ञान के लिये अलग एक साधन (इन्द्रिय) मानना ही पड़ेगा । जैसे चक्षु से गन्धज्ञान नहीं हो पाता, अतः उस ज्ञान के लिए पृथक् एक घ्राणेन्द्रिय माननी पड़ती है । तथा चक्षु और घ्राण से रसज्ञान नहीं होता, उसके लिये इन्द्रियान्तर रसनेन्द्रिय माननी पड़ती है। बाकी इन्द्रियों की आवश्यकता के बारे में भी यही समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार चक्षु-आदि से सुखादि ज्ञान गृहीत नहीं हो सकता, अतः उक्त ज्ञान के लिये इन्द्रियान्तर मानना ही पड़ेगा । वह इन्द्रिय ज्ञानायौग- पद्य हेतु वाली ( मन ) है । जो इन्द्रिय सुखाद्युपलब्धि में कारण ( साधन ) है वही ज्ञानायौगपद्य हेतु वाली है। प्रत्येक इन्द्रिय के साथ इस इन्द्रिय के सामीप्य या असामीप्य से ज्ञान उत्पन्न या अनुत्पन्न होते रहते हैं । अतः आपका यह कहना सर्वथा अनुचित है कि 'आत्मप्रतिपादक हेतुओं का मन से सम्बन्ध होने से मन सिद्ध होता है, आत्मा नहीं' ॥ १७ ॥ क्या यह आत्मा देहादिसंघात से अन्य होता हुआ नित्य है; या अनित्य ? यह संशय क्यों है ? क्योंकि लोक में दोनों ही नय देखे जाने से यहाँ संशय हो गया । लोक में, विद्यमान प्रमाणसिद्ध वस्तु नित्य भी देखी जाती है, अनित्य भी । आत्मा की सत्ता प्रति- पादित कर देने पर भी उसके नित्यत्व के बारे में अभी संदेह निवृत्त नहीं हुआ ? आत्मसत्ताप्रतिपादक हेतुओं से आत्मा की अवस्थिति देहादि से पूर्व सिद्ध हो चुकी, उन्हीं हेतुओं से वह देहादिनाश के बाद भी अवस्थित हैं, क्यों ?— पूर्वजन्माभ्यस्त स्मृत्यनुबन्ध से उत्पन्न हर्ष, भय, शोक आदि के सम्प्रतिपन्न होने से ॥ १८ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri