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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति' ॥ 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ॥ अथ ब्राह्मणानि— 'त्रयो धर्मस्कन्धाः—यज्ञोऽध्ययनं दानमिति, प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचा- र्याचार्यकुलवासीति तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वे एवैते पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' । 'एतमेव प्रव्राजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ति' इति । 'अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तथाक्रतु- र्भवति, यथाक्रतुर्भवति तथा तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते' । इति कर्मभिः संसरणमुक्त्वा प्रकृतमन्यदुपदिगन्ति— 'इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आत्मकाम आप्त- प्राप्त हुए; तथा दूसरे बुद्धिमान् धर्मज्ञ ऋषि उन कर्मों से दूर रहकर अमृतत्व ( अपवर्ग ) पा गये । उन्हें न कर्म से, न पुत्रपौत्रादिक से, न धन से यह अमृतत्व मिल पाया अपितु केवल त्याग से मिल पाया । यह अमृतत्व अविद्या से दूर गुह्यतम होते हुये भी देदी- प्यमान तेजःपुंज है, जिसे जितेन्द्रिय पुरुष ही पा सकते हैं । तैत्तिरीयारण्यक (३. १२. ७) में लिखा है—'मैं इस आदित्यवर्ण ( तेजोमय ) तम (अविद्या) से दूर महान् पुरुष (आत्मा) को जानता हूँ । इसी को जानकर मनुष्य मृत्यु (जन्म-मरण) को पार कर सकता है । मोक्ष का अन्य कोई मार्ग नहीं है।' अब ब्राह्मण के कुछ उदाहरण सुनिये— छान्दोग्योपनिषद् (२. २३. १) का ब्राह्मणवाक्य है—'ये तीन धर्मस्कन्ध हैं । यज्ञ, अध्ययन तथा दान यह प्रथमस्कन्ध (गृहस्थ), तथा तप द्वितीयस्कन्ध (वानप्रस्थ) है । तीसरा है—आचार्य कुल में रहकर ब्रह्मचर्यव्रतपूर्वक आचार्य की आज्ञा में अपना समय बिताना (ब्रह्मचर्य) । ये सभी पुण्यफलप्रद हैं । परन्तु ब्रह्मज्ञानी (संन्यासी) अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है, अतः वह श्रेष्ठ हैं'। बृहदारण्यक के ब्राह्मण (४. ४. २२) में लिखा है—'इसी संन्यासियों के लोक को चाहते हुए बुद्धिमान् लोग प्रव्रज्या लेते हैं।' दूसरे स्थान (४. ४. ५) पर यही कहता है—'ज्ञानी लोग कहते हैं यह प्राणी वासनामय है, जैसी वासना करेगा वैसे इसके संकल्प होंगे, संकल्पों के अनुसार यह कर्म करेगा; जैसा कर्म करेगा वैसा फल मिलेगा।' इस तरह संसार को कर्ममय बताकर प्रसङ्गोपात्त दूसरी बात का भी उपदेश देते हैं—'यह तो हुई वासना की बात; परन्तु जिसको वासना नहीं है वह अकाम पुरुष CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri