न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
Page 329 of 410
Read in context६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११ कामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते । ब्रह्मौव सन् ब्रह्माप्येति' इति । तत्र यदुक्तम्—'ऋणानुबन्धादपवर्गाभावः' इत्येतदयुक्तमिति । 'ये चत्वारः पथयो देवयानाः' इति च चातुराश्रम्यश्रुतेरेकाश्रम्यानुपपत्तिः ॥ ६० ॥ फलार्थिनश्चेदं ब्राह्मणम्—'जरामर्य्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च' इति । कथम् ? समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुत्वा आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' इति श्रूयते, तेन विजानीमः—प्रजावित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थि- तस्य निवृत्ते फलार्थित्वे समारोपणं विधीयते इति । एवं च ब्राह्मणानि—"सोऽन्यद् व्रतमुपाकरिष्यमाणो याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमिति होवाच—प्रव्रजिष्यन् वा अरे अहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्या सहान्तं करवाणीति । अथाप्युक्तानुशासनासि मैत्रेयि एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति" ॥ ६१ ॥ वासनारहित हो आत्मज्ञान चाहता हुआ पूर्णसङ्कल्प हो जाता है, उसके प्राण फिर इधर- उधर नहीं भटकते । वह शाश्वत हो जाता है, ब्रह्मरूप हो ब्रह्म में लीन हो जाता है ।' इतनी ऋचाओं तथा ब्राह्मणों का प्रमाण मिलने के बाद भी आपका 'ऋणानुबन्ध से अपवर्ग नहीं होता'— यह कहना अयुक्तियुक्त ही है । अपि च—तैत्तिरीयसंहिता (५. ७. २. ३) में तो 'ये चार आश्रम देवलोक में जाने के मार्ग हैं'—यह कह कर स्पष्ट ही चार आश्रम स्वीकार कर लिए गये हैं ॥ ६० ॥ उक्त 'वार्धक्यपर्यन्त यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास यज्ञ हैं'—यह शतपथब्राह्मण- वाक्य फलार्थी को लेकर कहा गया है, न कि यह प्रव्रज्या की मर्यादा का बोधक है । कैसे ? (आगे चल कर) अग्नियों का आत्मा में समारोपण बताने से प्रव्रज्या का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके उसमें अपना सर्वस्व दानकर उन अग्नियों को आत्मा में रखकर ब्राह्मण प्रव्रज्या ग्रहण कर लें'—ऐसा श्रुतिवाक्य हैं। इससे हम अनु- मान करते हैं कि यह वाक्य पुत्रैषणा, धनैषणा, तथा लोकैषणाओं को त्यागकर गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त पुरुष की फल-कामनायें निवृत्त हो जाने पर उनमें अग्नि का समारोपण विहित करता है । गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त की प्रव्रज्या विहित है, तभी यह (बृहदारण्यक का) ब्राह्मणवाक्य भी उपपन्न हो पाता है—"वे याज्ञवल्क्य दूसरा व्रत करना चाहते हुए मैत्रेयी से बोले—'या प्रव्रज्या लेकर मैं इस स्थान (जन्ममरणरूपी संसार) से कात्यायनी के साथ अपना छुटकारा कर लूंगा । मैत्रेयि ! तुम यह अच्छी तरह समझ चुकी हो कि वही पद (अपवर्ग) अमृतत्वयुक्त है'—ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य प्रव्रजित हो गये" ॥६१॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri