न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in contextपापकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वदुःखोच्छेदं सर्वदुःखसंविदमपवर्गं न रोचयेदिति । तद्यथा-मधुविषसम्पृक्तान्नमनादेयमिति, एवं सुखं दुःखानुषक्त- मनादेयम्' इति ॥ २ ॥ २. प्रमाणप्रकरणम् [ ३-८ ] त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशः, लक्षणम्, परीक्षा चेति । तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः । तत्रोद्दिष्टस्य तत्त्वव्यवच्छेदको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य 'यथालक्षणमुपपद्यते न वा' इति प्रमाणैरवधारणं परीक्षा । तत्रोद्दिष्टस्य प्रविभक्तस्य लक्षणमुच्यते, यथा-प्रमाणानां प्रमेयस्य च । उद्दिष्टस्य लक्षितस्य च विभागवचनम्, यथा छलस्य-'वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या च्छलम्, तत्त्रिविधम्'-( १. २. ५१-५२ ) इति । अथोद्दिष्टस्य विभागवचनम्— प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥ ३ ॥ अक्षस्याऽक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः = प्रत्यक्षम् । वृत्तिस्तु-सन्निकर्षः, ज्ञानं वा। यदा सन्निकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः, यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् । विनष्ट हो गये, कौन बुद्धिमान् ऐसे सब दुःखों तथा उनकी अनुभूति से छुटकारा दिलाने- वाले अपवर्ग को न चाहेगा ! जैसे जहर मिला हुआ मीठा भोजन नहीं खाया जाता, वैसे ही दुखानुपक्त सुख भी नहीं चाहा जाता' ॥ २ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा—यों तीन प्रकार से इस शास्त्र की प्रवृत्ति होती है। उनमें केवल नाम लेकर पदार्थ का गिनाना 'उद्देश' कहलाता है। उद्दिष्ट ( नाममात्र से गिनाये गये ) का स्वरूपभेदक धर्म 'लक्षण' कहलाता है। लक्षित (स्वरूपभेदक धर्मवान्) का 'यह लक्षणानुसारी है या नहीं'—इसका प्रमाणों से निश्चय करना 'परीक्षा' कहलाती है। यह विभाग पुनः दो प्रकार का है—१. जो उद्दिष्ट तथा प्रविभक्त हैं उनका लक्षण कहा जाता है, जैसे—प्रमाण और प्रमेयों का । २. तथा जो उद्दिष्ट तथा लक्षित हैं उनका विभाग कहा जाता है, जैसे—छल का विभागवचन ( १. २. ५१-५२ )। अब यह उद्दिष्ट का विभागवचन है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-ये चार प्रमाण ( हैं ) ॥ ३ ॥ इन्द्रिय की प्रत्येक विषय को लेकर वृत्ति ही 'प्रत्यक्ष' कहलाती है। संनिकर्ष या प्रमिति ही यहाँ 'वृत्ति' पद का वाच्य है। जब संनिकर्ष होगा तभी ज्ञान होगा, वही प्रमिति है, और तब हान (त्याग), उपादान (ग्रहण) या उपेक्षा बुद्धि रूप फल निष्पन्न होगा ।