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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अनुमानम्-मितेन लिङ्गेन लिङ्गिनोऽर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम् । उपमानम्-सारूप्यज्ञानम्१, 'यथा गौरेवं गवयः' इति । सारूप्यं२ तु सामान्ययोगः । शब्दः-शब्द्यतेऽनेनार्थ इत्यभिधीयते = ज्ञायते । 'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानि' इति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोद्धव्यम् । 'प्रमीयतेऽनेन' इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः । तद्विशेषसमाख्याया अपि तथैव व्याख्यानम् । किं पुनः प्रमाणानि प्रमेयमभिसम्पप्लवन्ते ? अथ प्रमेयं व्यवतिष्ठन्त इति ? उभयथा दर्शनम्-'अस्त्यात्मा' इत्याप्तोपदेशात् प्रतीयते, तत्रानुमानम्-'इच्छा- द्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' ( १ १. १० ) इति, प्रत्यक्षम्-युञ्जा- नस्य योगसमाधिजमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मा प्रत्यक्ष इति । अग्निरप्तो- पदेशात् प्रतीयते-'अत्राऽग्निः' इति, प्रत्यासीदता धूमदर्शनेनानुमीयते, प्रत्यासन्नेन अनुमान-व्याप्ति या पक्षधर्मता से प्रमित लिङ्ग ( हेतु ) द्वारा लिङ्गी ( ज्ञाप्य ) अर्थ के पश्चात् ( प्रत्यक्षानन्तर हुए ) मान को 'अनुमान' कहते हैं। उपमान-सादृश्यज्ञान को 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी यह गौ है ऐसा ही गवय होता हैं' । सारूप्य से तात्पर्य है सामान्य सादृश्य सम्बन्ध । शब्द-जिस विभक्त्यन्तसमूह से वाक्यार्थबोध होता हो वह 'शब्द' प्रमाण है। प्रमाण उपलब्धि के साधन हैं-यह 'प्रमाण' इस समाख्या ( नाम ) के निर्वचन ( 'प्रमीयतेऽनेन' इस तृतीया समास ) से समझना चाहिए । 'प्रमीयतेऽनेन' (जिसके द्वारा प्रमिति की जाये)-इस व्युत्पत्ति से 'प्रमाण' शब्द करण अर्थ को बतलाता है। तत्तद्विशेष ( प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द ) की समाख्या का भी इसी तरह करणव्युत्पत्ति से व्याख्यान समझना चाहिए । क्या एक एक प्रमेय में कई प्रमाणों का व्यापार होता है ? या एक एक का ही ? १. कई प्रमाण भी देखे जाते हैं। जैसे 'आत्मा हैं' इसमें आप्तोपदेश (शाब्द) प्रमाण है, 'इच्छा द्वेष, सुख दुःख, प्रयत्न, ज्ञान-ये आत्मा के लिंग हैं' (१. १. १०) यह अनुमान प्रमाण भी है, तथा आत्मा में मनोयोगविशेष करनेवाले को योगसमाधिज प्रत्यक्ष भी होता है अतः हम यह मान सकते हैं कि आत्म-मन के सम्बन्धविशेष से आत्मा का प्रत्यक्ष भी होता है। इसी तरह अग्नि के बारे में आप्तादेश (वृद्धोपदेश) से 'यह अग्नि हैं' ऐसा ज्ञान होता है। पर्वत के समीप जानेवाले को धूमदर्शन से अनुमान द्वारा वह्नि- ज्ञान होता है। समीप गये हुए को प्रत्यक्ष भी होता है। २. एक प्रमाण भी देखा जाता १. 'सामीप्यज्ञानम्'-इति पाठ० । २. 'सामीप्यम्'-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri