BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 376 of 410

Read in context
Page 376

३५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० धर्मान्तरमविशेषेण, नैवं सर्वभावानां सद्भावोपपत्तिनिमित्तं धर्मान्तरमस्ति येनाविशेषः स्यात् । अथ मतम् 'अनित्यत्वमेव धर्मान्तरं सद्भावोपपत्तिनिमित्तं भावानां सर्वत्र स्यात्'—इति ? एवं खलु वै कल्प्यमाने अनित्याः सर्वे भावाः सद्भावोपपत्तेरिति पक्षः प्राप्नोति, तत्र प्रतिज्ञार्थव्यतिरिक्तमन्यदुदाहरणं नास्ति, अनुदाहरणश्च हेतुर्नास्तीति । प्रतिज्ञैकदेशस्य चोदाहरणत्वमनुपपन्नम्—न हि साध्यमुदाहरणं भवति । सतश्च नित्यानित्यभावादनित्यत्वानुपपत्तिः । तस्मात् 'सद्भावोपपत्तेः सर्वाविशेषप्रसङ्गः' इति निरभिधेयमेतद्वाक्यमिति । सर्वभावानां सद्भावोपपत्तेर- नित्यत्वमिति ब्रुवताऽनुज्ञातं शब्दस्यानित्यत्वम्, तत्रानुपपन्नः प्रतिषेध इति ॥२४॥ उपपत्तिसमप्रकरणम् [ २५-२६ ] उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः ॥ २५ ॥ यद्यनित्यत्वकारणमुपपद्यते शब्दस्येत्यनित्यः शब्दः, नित्यत्वकारण- मप्युपपद्यतेऽस्यास्पर्शत्वमिति नित्यत्वमप्युपपद्यते । उभयस्यानित्यत्वस्य नित्य- त्वस्य च कारणोपपत्त्या प्रत्यवस्थानम् उपपत्तिसमः ॥ २५ ॥ अस्योत्तरम्— से अनित्यत्व धर्मान्तर अविशेषतया माना गया है, इस प्रकार सभी भावों का सद्भावो- पत्तिमात्र से धर्मान्तर कल्पित नहीं होता, जो कि 'अविशेष' हो सके । यदि यह मान लें कि सभं भावों का सद्भावोपपत्तिनिमित्तक धर्मान्तर अनित्यत्व ही है ? इस मत के मानने पर 'सभी भाव सद्भावोपपत्ति से अनित्य हैं' यह पक्ष बनेगा, यहाँ प्रतिज्ञावाक्यार्थ के अतिरिक्त और कोई उदाहरण नहीं है, उदाहरण के बिना हेतु नहीं बनता । दूसरे, प्रतिज्ञा का एकदेशवाक्य उदाहरण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता; क्योंकि साध्य उदाहरण नहीं हुआ करता । यहाँ साध्य सत् कहीं नित्य है, कहीं अनित्य, अतः वह एकान्ततः अनित्य नहीं बन सकता । अतः 'सद्भाव से सभी अनित्य होने लगेंगे'—यह मत अर्थशून्य ही है । सभी भावों में सद्भावोपपत्ति द्वारा अनित्यत्व मानने से शब्द का अनित्यत्व भी सिद्ध होता है, अतः उसके लिये उक्त प्रतिषेध करना कठिन होगा ॥ २४ ॥ अब 'उपपत्तिसम' का लक्षण करते हैं— दोनों कारणों की उपपत्ति से 'उपपत्तिसम' दोष कहलाता है ॥ २५ ॥ यदि शब्द का अनित्यत्व कारण उपपन्न होने से वह अनित्य है तो उसका अस्पर्श होने से नित्यत्व कारण भी उपपन्न हो सकता है, यों दोनों कारणों—नित्यत्व, अनित्यत्व— की उपपत्ति से एकतर पक्ष सिद्ध नहीं होता, यह प्रतिषेध 'उपपत्तिसम' कह- लाता है ॥ २५ ॥ इसका समाधान—