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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२८. सू० ] उपलब्धिसमप्रकरणम् ३५९ उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः ॥ २६ ॥ 'उभयकारणोपपत्तेः' इति ब्रुवता नानित्यत्वकारणोपपत्तेरनित्यत्वं प्रति- षिध्यते, यदि प्रतिषिध्यते, नोभयकारणोपपत्तिः स्यात्। उभयकारणोपपत्ति- वचनादनित्यकारणोपपत्तिरभ्यनुज्ञायते, अभ्यनुज्ञानादनुपपन्नः प्रतिषेधः। व्याघातात् प्रतिषेध इति चेत् ? समानो व्याघातः। एकस्य नित्यत्वानित्यत्व- प्रसङ्गं व्याहतं ब्रुवतोक्तः प्रतिषेध इति चेत् ? स्वपक्षपरपक्षयोः समानो व्याघातः। स च नैकतरस्य साधक इति ॥ २६ ॥ उपलब्धिसमप्रकरणम् [ २७-२८ ] निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः ॥ २७ ॥ निर्दिष्टस्य प्रयत्नानन्तरीयकत्वस्यानित्यत्वकारणस्याभावेऽपि वायुनोदनाद् वृक्षशाखाभङ्गस्य शब्दस्यानित्यत्वमुपलभ्यते। निर्दिष्टस्य साधनस्याभावेऽपि साध्यधर्मोपलब्ध्या प्रत्यवस्थानम्—अनुपलब्धिसमः ॥ २७ ॥ अस्योत्तरम्— कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥ 'प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्'—इति ब्रुवता कारणत उत्पत्तिरभिधीयते, न कार्यस्य उपपत्तिकारण की स्वीकृति से उक्त प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २६ ॥ 'दोनों कारणों की उपपत्ति से' ऐसा कहनेवाले का अनित्यत्वकारणोपपत्ति की मान्यता से अनित्यत्व प्रतिषिद्ध नहीं होता। यदि प्रतिषिद्ध होता है तो 'उभयकारणो- पपत्ति' नहीं बनेगी; क्योंकि उभयकारणोपपत्ति से आप अनित्यत्वकारणोपपत्ति स्वीकार करते ही हैं, इस स्वीकृति से प्रतिषेध नहीं बनता। एक ही में नित्यत्व तथा अनित्यत्व बताकर वचनविरोध द्वारा उक्त प्रतिषेध किया जा रहा है—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि उक्त वचनविरोध स्वपक्ष-परपक्ष में समान ही है, वह किसी एक पक्ष का साधक नहीं हो सकता ॥ २६ ॥ अब 'उपलब्धिसम' का लक्षण करते हैं— निर्दिष्ट कारण का अभाव होने पर भी उपलब्धि से 'उपलब्धिसम' प्रतिषेध कहलाता है ॥ २७ ॥ शब्द में प्रयत्नानन्तरीयकत्वरूप निर्दिष्ट अनित्यत्वकारण का अभाव होने पर भी वायुप्रेरित वृक्ष की शाखा के टूटने से जो शब्द होता है उसकी तरह उसका अनित्यत्व उपलब्ध होता है, अतः निर्दिष्ट साधन के अभाव में भी साध्यधर्मोपलब्धि से प्रतिषेध 'उपलब्धिसम' कहलाता है ॥ २७ ॥ इसका उत्तर है— कारणान्तर द्वारा उस धर्म की उपपत्ति होने से ( उसी की सिद्धि होती है, अतः उक्त) प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २८ ॥ शब्दानित्यत्वप्रसंग में 'प्रयत्नानन्तरीयकत्व' हेतु से जो सिद्ध किया है उसमें कारण